Total Pageviews

Monday, December 25, 2023

 THE IRRESISTIBLE CALL

Ms. Introvert couldn't sleep the whole night. She had to catch a train the next day. The non- cozy, non- familiar train. The train doesn't give her comfort. The train throws her among so many unfamiliar faces and takes her to another place among another set of unfamiliar faces. 

Ms. Introvert didn't like the idea of traveling. But, she couldn't stay back. She was only eight years old. She had to travel with her family. Thousands of thoughts kept her awake throughout the night. She cursed the invention of the train. She prayed to God for some solution. All in vain…

She knew there was no way out. She has to travel in all possibilities. “People would laugh at me.” Fear gave her goosebumps. “How would I eat in a train?”. She cried silently. “How would I use the washroom on the train?” She cried more, but was careful at the same time that no one should be awake. “How would I reply if the person sitting in front of me would ask something?” Hopeless she was. 

Actually Ms. Introvert used to fall short of words while talking to strangers though she was the chirpiest person and queen of endless conversation in front of her mother. 


That fateful night passed by quickly. Time was running faster than usual. It was an early morning train, so everyone in the family was in a great rush. No one could read the fear written around Ms. Introvert’s face. They hurried and reached the railway station. It was a small railway station. The train had not arrived yet. The railway tracks were shining with the sunlight.


THAT WAS THE MOMENT. 

Ms. Introvert heard that irresistible call of the railway tracks.

Ms. Introvert vanished. 


Two decades have passed since that incident. 

This morning, one happy and confident girl got down at the same small railway station. This girl likes to travel by train. The cozy train seats give her comfort. The changing panorama outside the window is a treat to her eyes. Reading while traveling is so therapeutic to her. This girl has gone on so many solo trips as well. She can discuss anything with anyone confidently though she avoids doing so by wearing headphones all the time. She is more than eager to explore every place she has read in her Geography book. She is amazed at the fact that the world is woven by a network of railway tracks.

On this railway station, this confident girl smiled at Ms. Introvert who had vanished two decades ago.


Two decades ago, on that fateful morning, while waiting for the train and gazing the railway tracks shining with early morning sunrays; Ms. Introvert had the moment of realization. She had realized that deep down in her head, she wanted to travel the world. She wanted to explore every place she had read about in her Geography book. The irresistible call of the railway tracks helped her in overcoming her fear. The morning breeze relaxed her. 

This change in her personality was so silent that no one in her family could notice. But the railway tracks, the morning breeze and the sunshine witnessed the moment.

So, this morning when Ms. Introvert turned Ms. Confident smiled at herself; the same old railway tracks and the fresh morning breeze and the new sunshine giggled with her.


POV: sometimes revolutionary change takes place silently.


Note:Based on true incidents.

Name of Ms. Introvert turned Ms. Confident is Prachi. 





Thursday, October 26, 2023


एक प्रेमकथा 



सुबह-सुबह सूरज उससे मिलने आया. वो आलस की बाँहों में सो रही थी. सूरज ने बुरा नहीं माना. उसको पता है अक्टूबर में भले ही वो आलस को गले लगाए, दिसंबर- जनवरी में सूरज से मिलने को बेताब वो भागी- भागी छत पर जरूर आएगी, प्रतीक्षा करेगी; गोल- गोल घूम- घूमकर सूरज की किरणों से लिपटने की कोशिश करेगी. अपने प्रारब्ध पर सूरज को यकीन है. सूरज निश्चिन्त है उसके जीवन में अपने स्थान को लेकर. अतः उसके आलस की बाँहों में सोते रहने का उसने बिलकुल बुरा नहीं माना. सुबह- सुबह भागा- भागा आया तो था उससे  मिलने, पर वो  नहीं मिल पाई तो नाराज नहीं हुआ. चुपचाप उसके पीले दुपट्टे की स्वर्णिम आभा को और बढ़ा गया. पास लटकते बाकी दुपट्टों  की चमक भी बढ़ा गया. 

सूरज एक अनोखा प्रेमी है. वो insecure बिलकुल नहीं है. अपने प्रारब्ध से उसको शिकायत बिलकुल नहीं है. उसको पता है उसकी प्रेमिका सिर्फ दिसंबर- जनवरी में उसको गले लगाती है. फ़रवरी बीतते- बीतते प्रेमभरे दिन भी बीतने लगते हैं. अधिक- से- अधिक होली के त्योहार वाले दिन रंगो से सरोबार प्रेमिका उसको गले लगाती है और फिर कई महीनों की जुदाई शुरू हो जाती है. एक संयमित प्रेमी है सूरज. प्रेमिका से मिलने की बेताबी में अपनी तपिश कभी नहीं खोता. जगत के प्रति अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलता. सूरज को पता है उसकी दिनचर्या पर ब्रह्मांड की दिनचर्या निर्भर है. अगर प्रेमिका से मिलने की चाह में उसने सालोभर अपनी तपिश दिसंबर- जनवरी जितनी कम रखी तो क्या परिणाम हो सकते हैं. विश्व की आबादी जिस प्रकृति की आदि है, प्रतिकूल वातावरण मिलने पर नष्ट हो सकती है. ध्रुवों पर दिखनेवाले जिन northern lights की दुनिया दीवानी है, अगर वो सालोंभर दिखने लगा तो महत्ता कम हो जाएगी. प्रेम भी तो ऐसा ही है. निरंतर प्रेम से ऊब हो सकती है. सूरज को ये सब पता है, अतः वह संयमित है. एक दबी हुई चाह ये भी है कि तपिश बढ़ाने पर ही तो उसकी प्रेमिका को प्रिय तरबूज और आम जैसे फल मिलेंगे. अतएव ये सबके हित में है कि ये प्रेम- कहानी अक्टूबर में रंगबिरंगे दुप्पटों की निखार बढ़ाने से शुरू हो और होली के रंगो से सरोबार होकर कुछ महीनों के विश्राम पर चला जाए. 

आज वो सुबह- सुबह ये बताने भी आया है कि तुम्हे प्रिय चीजें जैसे आंवला, सनई, गाजर, मटर और गन्ने अब मिलने लगे हैं, तुम इनका सेवन करके मुस्कुराओगी और तुम्हे देखकर मैं मुस्कुराऊंगा. पर, जब वो उससे मिल नहीं पाया क्यूँकि वो आलस की बाँहों में सो रही थी, तो वो बस उसके रंग- बिरंगे दुपट्टों की चमक और बढ़ा गया. सूरज को विश्वास है कि दुपट्टों के निखार से प्रेमिका को संदेश मिल जाएगा. आखिर सूरज प्रेम में विश्वास जो करता है.  

 

Saturday, October 14, 2023

मैडम आपका तख्त आ गया

"मैडम आपका तख्त आ गया"- दिनभर में इतनी ज्यादा बार ये वाक्य सुना कि मुझे महसूस होने लगा मानो मेरे लिए 'तख्त- ए- ताऊस' आया हो. 

तो हुआ यूँ कि कार्यस्थल पर कुछ तख्तों की आवश्यकता थी. उस कार्य की प्रभारी मैं थी. इसी वजह से कॉन्ट्रैक्टर से बात करना और उस से भी पहले मैनेजमेंट के अधिकारियों और प्रिंसिपल मैडम से बात कर के इस कार्य को गति प्रदान करना मेरा काम था. इसी क्रम में इतनी ज्यादा बार ऑफिस में तख्त के बारे में बात हुई थी कि सबको ये बात याद हो गई थी. 

अब जब सुबह सुबह कार्यस्थल पहुँची तो देखा कि जिन तख्तों की आवश्यकता थी उनकी डेलिवरी कॉन्ट्रैक्टर ने कर दिया था और वो नीचे गलियारे में रखी थी. तख्त सुई जैसी चीज तो है नहीं जो दिखाई ना दे, लेकिन तबतक ऑफिस में जितने लोग पहुंचे थे, सबने मुझे बताया कि मेरा तख्त आ गया. 

उसके बाद मैं ऊपर चली गई और दो घंटे अपने कामों में व्यस्त रही. इस बीच सहकर्मिओ से मेरे तख्त और इसकी सही समय पर डेलिवरी के बारे में बात हुई. मुझे ये बताया गया कि मेरे तख्त पर और लोग बैठे हैं और ये भी कि मेरे नए तख्त पर हुए पेंट की खुशबू दूर- दूर तक फैली हुई है. इन बातों पर चर्चा करने में मजा तो मुझे भी आ ही रहा था. छात्राओं ने भी बताया कि नया तख़्त आ गया. 

फिर और कामों से मैं नीचे वाले ऑफिस में पहुंची. तबतक और लोग भी आ चुके थे. एक स्टाफ मुझे देखते ही बोल पड़े, "और मैडम, आपका तो चौकी- वौकी आ गया". मैं मुस्कराई. इस से पहले मैं कुछ कहती पास खड़े एक और सज्जन बोल पड़े, "ये ना कहिए मैडम कि टाइमली डेलिवरी हो गया आपके तख्त का, नहीं तो बहुत दिक्कत होता". मैंने कहा, "जी ये बात तो  है". 

(शाम को फ़ोन पर जब  मैंने दीदी को "और मैडम, आपका तो चौकी- वौकी आ गया" वाली बात बताई तो दीदी का  रिमार्क आया, "तुम्हारी चौकी- वौकी आ गई, नवरात्रि आ ही रही है; चौकी पर विराजमान हो जाओ".) 

अबतक ये तख्त नीचे ही था. मैं प्रिंसिपल मैडम के पास गई. उनके बोलने से पहले मैंने ही बता दिया कि मेरा तख्त आ गया. मैंने मैडम से ये भी विनती की कि मेरे तख्त को ऊपरी मंज़िल तक पहुँचवा दिया जाए.

उसके बाद मैंने कॉन्ट्रैक्टर को फ़ोन किया. वो छूटते ही बोल पड़े, "मैडम, आपका तख्त हम पहुँचवा दिए है". मुझे हँसी आ गई. मैंने कहा, "हाँजी हाँजी, बस उसी लिए कॉल किया था कि मेरा तख्त मिल गया है, लेकिन इसके साथ कुछ और ऑर्डर किया था वो नहीं मिला है". दरअसल बड़े तख्त के साथ कुछ छोटे तख्तों की भी आवश्यकता थी, जो अभी भी नहीं आया था. कॉन्ट्रैक्टर साहब मानों नींद से जागे. कहने लगे, "अच्छा वो$$$, वो तो अभी नहीं बना है". मैंने उनको निर्देश देकर फ़ोन रख दिया. 

इसके बाद मेरी ड्यूटी परीक्षा- वीक्षक के तौर पर थी, यानी दोपहर ढेड़ बजे से शाम पाँच बजे तक मैं इधर- उधर नहीं जा सकती थी. इसी बीच तख्त को ऊपरी मंजिल पर पहुँचाया जाने लगा. मैंने पहले ही काफी लोगों को बता रखा था कि तख्त कहाँ रखा जाना है, बावजूद इसके एक सहकर्मी ने कहा, "मैडम, आपका तख्त ऊपर रखा जा रहा है, आप चेक कर लीजिये सही जगह पर रखा या नहीं." मेरे ये कहने पर कि अभी फिलहाल मैं कहीं नहीं जा सकती, उन्होंने जोर देकर कहा कि मैडम परीक्षा के बाद जरूर ऊपर जाकर अपना तख़्त देख लीजिए. 

परीक्षा समाप्त होने के बाद कंट्रोलर रूम में एक स्टाफ ने फिर से बताया, "मैडम, आपका तख्त वहाँ रख दिए हैं जहाँ आपने बताया था". अब परीक्षा- नियंत्रक ने चुटकी ली, "मैडम का तख्त मैडम के घर पर न पहुँचाना चाहिए था, इधर- उधर कहाँ रख दिए". 

तो ये थी मेरी 'तख़्त- ए- ताऊस' की दास्तां, जो अब मेरे सपने में भी आने लगा है. 

अगर आपको ये जानने में रूचि है कि तख़्त का कार्यस्थल पर क्या काम तो इस फोटो में उत्तर छुपा है. 


Monday, September 4, 2023

 A Little Angel Came Home

I have a story to tell. A little angel came to my house. He entered the room, directly went to pick my notebook with the heading 'CREATIVE MOOD', in which I write my stories, poems and everything that comes to my mind.  The little angel found my favourite Pencil as well. Many pens were kept there though.

With my favourite pencil, on my favourite notebook, he beautifully scribbled his favourite letters. Then I gave him a drawing book and he became busy with that. He drew green specs, red moustaches and what not. It reminded me of "Sky is Pink". He indeed has a beautiful world of his own.   

When he went back, I sat with my notebook smiling. Suddenly I saw something written between the lines. This little angel of Goddess Saraswati very innocently and without being preachy taught me some things. Firstly, he taught me to start with basics. Its not that you have to write the plot of a novel in a notebook called 'CREATIVE MOOD'. Just write some basic letters everyday. Letters would automatically turn into words, eventually turning into meaningful sentences and then ultimately a story or a novel or anything that comes under the category 'CREATIVE' justifying the notebook- head. 

Second, he taught me to focus on primary things. No matter where you are, pick the things of your interest; ignore the world around you and just do it.

 Thank you little angel for coming to my house, bringing in such a positivity and giving me a reason to write this Blog, which I had not been able to do for months.

Please Come again. 

Thursday, September 29, 2022

 तटिनी के तट पर मन की बात 


 

    आज नदी से मुलाकात हुई. मैंने देखते ही हाथ जोड़े- प्रणाम गंगा मईया. गंगा मईया ने हँसकर आशीर्वाद दिया- विकसित होती रहो बिटिया. मैं मुस्कुराई. "खुश रहो" के मुकाबले "विकसित होती रहो" ज्यादा अच्छा लगा. मैंने कहा- मईया, समस्त मानव सभ्यताएँ आपके और आपकी बहनों के तट पर ही विकसित होती रही हैं. मैं भी अपनी गति से बढ़ रही हूँ.  

    तब नदी ने कहा- वह तो शुरुआती दिनों की बात थी. तुम पूरी तरह मुझपर आश्रित नहीं हो. 

    नदी के शब्दों में उलाहना का भाव था. मैं समझ गई कि हजारों वर्षों की अपनी लंबी जीवन- यात्रा में नदी अब उपेक्षित महसूस करती है. 

    मैंने मनौती करते हुए कहा- मईया, भौतिक रूप से भले ही मैं आपपर आश्रित ना होऊं, भले ही प्रतिदिन स्नान करने आपके तट पर ना आऊं, घड़ों में पीने का पानी भरकर ना ले जाऊँ; भावनात्मक आश्रय सदैव आपके पास ही मिला है. आपके पास आकर ही सुकून मिलता है, ठहरी हुई जिंदगी में बहाव आता है. 

    नदी ने मुँह ऐंठा- भला वो कैसे? 

मैंने अब अपने शब्दों को थोड़ा और कोमल किया- मईया, मेरे अबतक के जीवन की कहानी तो सुनो. मेरे गांव के पास से तो आप बहती नहीं. नानी घर जाते हुए रेलगाड़ी की खिड़की से आपको देखा था. बड़ा कौतुहल हुआ था. आपकी विशालता से नहीं, बल्कि आपके संयम और धैर्य से. हम मनुष्यों को कोई लाँघ जाए तो बड़ी लड़ाइयाँ हो जाती हैं. आप इतने बड़े जनसमूह को स्वयं को लांघने की अनुमति दे देती हैं. पुल से स्वयं को बांधने देती हैं; जबकि आप ज्यादा ताकतवर हैं हम तुच्छ मनुष्यों के आगे. इतना धैर्य कहाँ से लाती हैं आप? चाहकर भी नहीं सीख पाई मैं इतनी सहिष्णुता. फिर भी जीवन में जो लेशमात्र धैर्य है, आपसे ही सीखा है. पर स्वयं को लाँघ जाने वाले को क्षमा कर सकूँ, ये गुण ना सीख पाई अबतक. 

    नदी ने मुझे गौर से देखा- तो इसीलिए तुम्हे मुझसे लगाव है. 

    मैं गड़बड़ा गई- और भी बहुत सी घटनाएँ हैं माँ. 

    नदी ने ठहरकर मुझे सुनना शुरू किया. 

    मैंने आगे की कहानी बताई- मेरे गांव में कुछ औरतें थीं; बिलकुल लाल पान की बेगम सी. किसी न किसी बात को लेकर उनमे अनबन हुई ही रहती थी. लेकिन, जैसे ही गंगा स्नान पर जाने की बात शुरू होती थी, सब- की- सब संगठित हो उठती थीं. एकता का वैसा नमूना फिर कभी कहीं और नहीं देखा. रिविलगंज घाट पर गंगा- स्नान करने जाने के लिए सभी औरतें एक- दूसरे की हर- संभव सहायता करतीं. कोई पेटी में रखी नई साड़ी निकाल दूसरी को दे देती, कोई अपनी चप्पल दूसरी को दे देती. सत्तुआ- अचार और गुड़ की भेली को आपस में बाँटकर साम्यवाद का अनूठा उदाहरण पेश करती ये औरतें स्नान के बाद खरीददारी में भी एक- दूसरे की मदद करती थीं और खून- पसीने की कमाई से संजोए पैसों से सबके लिए टिकुली- सिंदूर और जलेबी- बताशे खरीद कर लाती थीं. अभावों भरे जीवन को धता बताकर खुशियों के चंद पल चुरा लाती थीं. यह सब सिर्फ गंगा- मईया के नाम पर संभव हो पाता था.

    अब जब जीवन में उतने अभाव नहीं रहे, पर्व- त्योहार, जीवन- मृत्यु के अवसरों पर आपके तट पर एकत्रित होते आगे की पीढ़ियों को भी देखा है मैंने. 

    नदी कुछ पल खामोश रही. फिर कहा- इस पूरे प्रसंग में प्रत्यक्ष रूप से तुम तो कहीं नहीं हो, फिर मुझसे लगाव की वजह. 

    मैं नहीं होकर भी हूँ माँ. मैंने जल्दी से कहा. मैं हूँ इस प्रसंग में. इस एकता की साक्षी हूँ मैं. मेरी सारी संवेदनाओं का केंद्र आप ही हैं. धैर्य, सहिष्णुता और एकता तो सीखा ही है आपसे; कल्पनाशीलता भी आपकी ही देन है. अपनी बाल- मंडली की चर्चाओं में ये ज्ञान मिला था कि गंगा मईया संसार की सबसे बड़की नदी मईया हैं, जो शंकर भगवान की जटा से निकलकर पूरी धरती पर फैली हैं. बिना आपको देखे विश्व- मानचित्र पर आपकी उपस्थिति की कल्पना करने के साथ हीं मेरे अंदर की लेखिका ने जन्म लिया था. 

    आपके सबसे बड़ी नदी होने का तथ्य मेरे दिलो- दिमाग पर कुछ इस तरह बैठा था कि ऊपर की कक्षाओं में भूगोल विषय में संसार की अन्य नदियों का जिक्र अविश्वनीय लगता था. मेरे लिए नदी का पर्याय गंगा मईया थी. आज भी कल्पना की दुनिया यथार्थ की दुनिया से ज्यादा सुंदर लगती है. आपके बिना मेरी कलम नहीं चलती. 

    इसके अलावा आप मेरे घावों पर मलहम भी लगाती हैं और बिछुड़े हुओं से मिलाती भी हैं. महादेवी वर्मा की प्रिय हिरणी सोना मुझे भी उतनी ही प्रिय है. वो आपकी ही लहरों में विलीन हुई थी. इसीलिए जब भी सोना से मिलना होता है, आपके तट आती हूँ और सोना की झलक मिल जाती है. 

    झलक मिल जाती है उन विलुप्त हो चुकी सभ्यताओं की, जिन्हे इतिहास की किताबों में पढ़ा है. 

    अबकी बार नदी ने जल्दी से मेरी बात काटी- अगर तुम ये कहना चाहती हो कि उन सभ्यताओं के विनाश का कारण मैं हूँ, तो याद करो उनके विकास का कारण भी मैं ही थी. अगर जीवन मैंने दिया था, तो लेने का हक़ तो बनता है. मुझे लाँघो, मुझे बांधो, पर अपनी सीमा रेखा ना लाँघो; वरना मैं बनूँगी विनाश का कारण. 

    नदी के तर्कों पर मुझे स्वीकृति देनी पड़ी- "हाँ माँ, हक़ तो आपका ही बनता है." मन में विचार कौंधा- अस्पताल के बिस्तर पर बीमारी की वजह से मरने से कहीं ज्यादा सुंदर मृत्यु होती होगी प्रकृति माता की इस संतान की गोद में होनेवाली मृत्यु... पता नहीं मृत्यु कैसी होती है. 

    नदी ने मेरे मन को पढ़ लिया. बोली- इतना चिंतनशील होना ठीक नहीं. अल्हड़ बनो, गतिमान बनो. 

    मैं मुस्कुराई. कपड़ो से रेत झाड़ा और चलने को तैयार हुई. 

    नदी भी खिलखिलाई, उफनाई और तेज गति से चल पड़ी. 


 

 


Wednesday, September 14, 2022

बारिश 

रिमझिम बरसती ये बूँदे,
धुँधली यादों को नहलाती हैं. 
बीते लम्हों की डोर से,
मन को बाँध जाती हैं.
 
मन ये चंचल पीछे भागे,
उन पलों की खोज में.
जिन्हे कभी हमने था जिया, 
जीवन- धारा की मौज में.
 
ये बरसते आँसू हैं,
जो मातमपुर्सी को निकले. 
या बरस रही नेमत हैं ये,
जो प्रकृति- माता से हैं मिले. 
 
हरदम ये बूँदे मुझको,
स्तब्ध- सी कर जाती हैं. 
बीते लम्हों की डोर से, 
मन को बाँध जाती हैं.

 


Saturday, September 10, 2022

नैसर्गिक मिलन 


    धूल- धूसरित सुस्त पड़े पेड़ को जोर- जोर से हिलाती हुई हवा आई. हवा भागी- भागी ये संदेश लेकर आई थी कि उनकी सखी वर्षा रानी बस आने ही वाली है. 

    अलसाए पेड़ ने अचानक लगे धक्के से चिढ़ते हुए कहा,- "ऐ बावली हवा ! तू अपनी ख़ुशी दबा क्यूँ नहीं पाती. ये संदेश तू हल्की सरसराहट के साथ भी तो दे सकती थी."

    हवा ने पेड़ को और जोर का धक्का लगाया और कहा- "सरसराहट के साथ तो प्रियतम के आगमन की सूचना दूँगी. सखी वर्षा का आगमन तो उत्सव है उत्सव. 

    पेड़ अपने मोटे तने और पतली टहनियों का तारतम्य चंचल बावली हवा के साथ बिठाने की कोशिश कर ही रहा था कि वर्षा रानी आ पहुँची.

    अब पेड़ पर दोहरी मार पड़ी. हवा तो पहले से ही पेड़ को जोर- जोर से धक्के लगा रही थी; उसकी सखी वर्षा भी अब पेड़ को भिगोने लगी.  हवा का व्यवहार बिलकुल उन निश्छल बच्चो सा था, जो अपनी सखियों/ सखाओं के आगमन पर इतने खुश हो जाते हैं कि काबू में नहीं आते. 

    वर्षा रानी भी अपना कोष खाली करने के इरादे से आई थी. उसने झमाझम अपने अलसाये दोस्त को भिगो डाला. धूल- धूसरित सुस्त पेड़ अब नहा- धुलाकर और हरा, और जवान, और चुस्त हो उठा. 

    हवा भी भींग गई. भींगी हुई हवा की खुशबू भी बदल गई. वर्षा रानी की मादक बूँदो ने चंचला- अबोध- बालिका सी हवा को अचानक युवती बना डाला. अब वो शायद शर्माने लगी, और शांत हो गई. 

    पेड़ अब हौले से मुस्काया और युवती हवा को गले लगा लिया. अब दोनों ने एक- दूसरे को साध लिया. वर्षा रानी भी अब धीमे- धीमे से बरसने लगी. हवा मंद गति से बहने लगी और पेड़ मंद गति से डोलने लगा. 

    यह उनके मिलन की सरसराहट थी.

Between Goodbyes and the Next Hello

  Between Goodbyes and the Next Hello As the train hurriedly carries me back to work, I find myself reflecting on how differently time flows...