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Sunday, April 12, 2020

आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह संस्कार एवं इसकी जटिलता (भाग- 2)


आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह संस्कार एवं इसकी जटिलता (भाग- 2)



आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह संस्कार एवं इसकी जटिलता (भाग- 1) में जो भूमिका बांधी जा चुकी है, उसके आगे चर्चा शुरू कर रही हूँ. 

हमलोग पहले ही इस बात पर चर्चा कर चुके हैं कि विवाह सर्वाधिक जटिल एवं ताम- झाम वाला संस्कार है और इसके कई चरण होते है. मोटे तौर पर वे चरण हैं-
  • सुयोग्य वर- वधू की तलाश 
  • छेंका, रोक्का अथवा अंगूठी पहनाने की रस्म 
  • शुभ तिलकोत्सव 
  • शुभ- विवाह 
  • वर- वधू स्वागत समारोह 
  • हनीमून
पहले चरण पर चर्चा पिछले पोस्ट में हो चुकी है. आज दूसरे चरण की बारी है. 

2. छेंका, रोक्का अथवा अंगूठी पहनाने की रस्म

फिल्मों और टेलीविज़न धारावाहिकों के अलावा आम जीवन में भी बहुतायत में प्रयुक्त एक संवाद (डायलॉग) है- "चलें, मुँह मीठा करे. अब रिश्ता पक्का." तो यह जो प्रक्रिया है, वो मुँह मीठा करके रिश्ता पक्का करने वाला चरण है.  

कई बार मुँह मीठा करके भी शुरू किया गया रिश्ता कड़वाहट से बच नहीं पाता. जरा विचार करें उसके पीछे कारण क्या होता है. 
क्या बासी मिठाई इसका कारण होती है ?
अथवा,
लोगों के बासी से भी ज्यादा बासी विचार ?
मेरे ख्याल से अनगिनत अपेक्षाओं का बोझ सामने वाले पर डालते रहने वाले लोग ही बोते है कड़वाहट का बीज. ऐसी अपेक्षाओं का कोई ओर- छोर नहीं होता. 

हमारे यहाँ सामान्य तौर पर स्वजातीय विवाह की परंपरा है. अंतरजातीय विवाह भी प्रचलन में आ रहे हैं, पर मेट्रो शहरों की बात छोड़ दें तो ऐसे विवाहों की संख्या आज भी नगण्य है. स्वजातीय विवाह हों अथवा अंतरजातीय विवाह; मन का जुड़ाव एवं सम्मान की भावना अति- आवश्यक है. 

मैंने स्वजातीय विवाह परंपरा की बात इसलिए की, क्योंकि मुझे इसके पीछे के तार्किक आधार की चर्चा करनी थी. मेरे अवलोकन के अनुसार स्वजातीय विवाह परंपरा के पीछे का तर्क ये रहा होगा की एक ही तरह के परिवेश में रहे लोगों को एक- दूसरे के साथ सामंजस्य बैठाने में आसानी होगी. जैसा कि हम जानते हैं, हमारे यहाँ वैदिक काल से ही प्रत्येक जाति की कुछ विशेषताएँ तय की गई हैं एवं उनके कार्य भी निर्धारित हैं. विवाह आज भी मुख्यतः वैदिक रीति- रिवाजों से ही संपन्न होता है. अब इन दोनों तर्कों को एक साथ जोड़े तो स्वजातीय विवाह पर जोर देने का कारण यह होना चाहिए कि आपसी सामंजस्य से रिश्ता शोभित हो. परन्तु ऐसे विवाहों में भी कड़वाहट घोलने का काम अनगिनत अपेक्षाओं का बोझ सामने वाले पर लादने वाले लोग कर हीं डालते हैं, जिनकी चर्चा मैंने शुरू में की. 


यदि हम एक- दूसरे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को बिना बदलाव किये स्वीकार करना सीख लें तो स्वजातीय विवाह हों अथवा अंतरजातीय विवाह; दोनों सफल रहेंगे. परन्तु दखलअंदाजी तो हमारी विशेषता है. जबतक हम एक- दूसरे के उठने- बैठने, खाने- पीने, बोलने- चालने, कपड़े- लत्ते इत्यादि असंख्य चीजों पर टिप्पणी अथवा छींटाकशी ना कर लें, हमें चैन कहाँ मिलता है. अब इतने शब्द बाणों से बेधे गए रिश्ते कड़वे तो होंगे हीं, बेचारी मिठाई ताजा रहकर क्या कर लेगी

हाँ तो विवाह संस्कार के इस दूसरे चरण यानी छेंका, रोक्का अथवा अंगूठी पहनाने की रस्म के दौरान ही दोनों खानदानों के काफी लोगों का मिलन हो जाता है, छींटाकशी की शुरुआत हो जाती है और मिठाई खा कर शुरू किये गए रिश्ते में नमक डलना भी चालू हो जाता है.

'छेंका' नाम पर हीं हंसी आती है. इस रस्म में फल, मिठाई, कुछ आभूषण, कपड़े- लत्ते, रुपये- पैसे इत्यादि सांसारिक वस्तुओं को उपहारस्वरूप देकर अपना कब्ज़ा सिद्ध किया जाता है. 😁

'रोक्का' भी ऐसे ही मिलते- जुलते रस्म का नाम है, जिसमे फल, मिठाई, कुछ आभूषण, कपड़े- लत्ते, रुपये- पैसे इत्यादि सांसारिक वस्तुओं को उपहारस्वरूप देकर विवाह योग्य पक्ष को किसी और का होने से रोक लिया जाता है. 😄

'अंगूठी पहनाने की रस्म' या 'ENGAGEMENT' की रस्म मुख्यतः संचार- क्रांति की देन है. एक दशक पीछे जाएं तो यह रस्म नगण्य थी. आम आदमी के जीवन में इस रस्म का आगमन कराने में टेलीविज़न धारावाहिकों का प्रमुख योगदान है.

मुझे यह रस्म बड़ी मनोरंजक लगती है. दोनों खानदानों के चुनिंदा सम्बन्धियों का मिलन तो हो ही जाता है इस रस्म के दौरान, और बड़े बजट की शादियों में तो पूरे कुटुंब का मिलन अभी हीं हो जाता है. रिश्तेदारों को वर- वधू के प्रथम दर्शन हो जाते है. सजने- सँवरने का शौक रखने वालों को फैशन- परेड का एक और अवसर मिल जाता है, और मेरे जैसे तथाकथित ख़राब 'ड्रेसिंग- सेंस' वाले व्यक्ति की सांसत हो जाती है. 😅

ये सजने- सँवरने का बाजार पहले सिर्फ लड़कियों एवं महिलाओं तक सीमित हुआ करता था, अब लड़के इसमे मात देते नज़र आ रहे हैं. मेरे भाइयों के 'हेयर- जेल' से सँवारे गए बालों की वजह से और ज्यादा नुमायां होते मेरे 'झाड़- झंखाड़ बालों' को देखकर मुझे इस बात का शिद्दत से एहसास हुआ. 😂 

'अंगूठी पहनाने की रस्म' का एक और परिणाम ये होता है कि रिश्तेदारों के नीरस जीवन में थोड़ा रस आ जाता है. भले ही आँखों पर मोटा चश्मा लगा हो, दृष्टि बाज की हो जाती है. वर- वधू के समस्त गुणों- अवगुणों को वो लोग चश्में के पीछे से तोल लेते है. मसलन-

"लड़की के माथे पर आँचल नहीं है, पता नहीं सास- ससुर की इज्जत करेगी भी या नहीं."

अब कोई उनसे पूछे कि गाउन पहनकर सर पर पल्लू कैसे रखा जाता है. इस बात को भविष्य में सास- ससुर की इज्जत से जोड़ने का क्या तुक है. आखिर वो कन्या अभी 'मिस' ही है, 'मिसेस' नहीं बनीं. शादी के बाद ऐसे टोकने का कुछ औचित्य भी है, पर पहले ही क्यों?

वैसे तो किसी भी समय यह व्यक्तिगत चुनाव का मामला होना चाहिए, ना कि थोपे गए तथाकथित आदर्श का. इस मुद्दे पर हर कोई व्यक्तिगत विचार रखने को स्वतंत्र है. 

ऐसी बेतुकी टिप्पणियों से वर का सामना भी होता है. उसके सर पर थोड़े से भी कम बाल देखकर कुछ रिश्तेदार मुँह बिचकाते नज़र आते हैं; भले ही उनका खुद का दामाद पूरी तरह से 'उजड़ा चमन' क्यों न हो, बर्ताव ऐसे करेंगे जैसे वो 'केश- किंग' का 'ब्रांड- एम्बेसडर' हो. 😹 

कुछ रिश्तेदारों को ये जानने में दिलचस्पी होती है कि नौकरी सरकारी है या प्राइवेट. कुछ को खानदानी संपत्ति की जानकारी चाहिए होती है, तो कुछ को खानदानी इतिहास- भूगोल की. 

ऐसे ही अनगिनत सवालों- जवाबों एवं फोटोग्राफर द्वारा सुझाए गए अजीबोगरीब पोज़ करने के असफल प्रयास के बीच कुछ खट्टी- कुछ मीठी यह रस्म संपन्न होती है. 


नोट- मैंने कहा था न मुख्य संस्कार यानि विवाह तक पहुंचने की प्रक्रिया काफी लंबी, नाज़ुक एवं उलझाऊ होती है. मैंने अपने विचार साझा किए हैं. यदि किसी की भावना आहत हुई हो तो अग्रिम रूप से ही क्षमाप्रार्थी हूँ.

विवाह संस्कार के अगले चरणों की चर्चा अगले रविवार के पोस्ट में की जाएगी. आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह संस्कार एवं इसकी जटिलता (भाग- 1) पढ़ने के लिए यहाँ click करें. उस आलेख को आपका प्यार देने के लिए धन्यवाद.

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🖊 प्राची कुमारी

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Sunday, April 5, 2020

आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह संस्कार एवं इसकी जटिलता (भाग- 1)

   आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह संस्कार एवं इसकी जटिलता (भाग- 1)


यहाँ सर्वाधिक महत्व से मेरा तात्पर्य बेवजह की ताम- झाम एवं सर्वाधिक ध्यानाकर्षण से है. जवान होते लड़के- लड़कियों की तरफ हर किसी का ध्यान रहता है कि कब होगी शादी? कभी- कभी तो यह सवाल इतने ज्यादा मुखर रूप में सामने आता है मानों जीवन का चरम लक्ष्य शादी हीं हो. 

कन्या और वर का विवाह निश्चित होने यानि दोनों पक्षों के राज़ी होने से लेकर वास्तव में विवाह सम्पन्न होने तक की प्रक्रिया काफी लम्बी होती है. 

हाल ही में परिवार में एक विवाह समारोह के प्रमुख कर्ता- धर्ता के रूप में नजदीक से अवलोकन करके मैंने यह महसूस किया कि विवाह- संस्कार सर्वाधिक जटिल संस्कार है और संपूर्ण प्रक्रिया कई चरणों में संपन्न होती है

आज लॉकडाउन की स्थिति में जब शुभ लग्न होने के बावजूद कईयों के विवाह स्थगित करने पड़े हैं, मैंने सोचा क्यों ना लेखनी के माध्यम से एक आधुनिक भारतीय हिन्दू विवाह समारोह का आनंद उठाया जाए. 

वैसे भी टेलीविज़न पर 'रामायण' का पुनः- प्रसारण और राम- सीता विवाह प्रसंग देखने के बाद इस प्रसंग का वास्तविक जीवन से तुलनात्मक अध्ययन तो अवश्यंभावी है. (वैसे तो त्रेता- युग के प्रसंग का कलयुगी प्रसंग से तुलनात्मक अध्ययन एक दृष्ट्ता है, फिर भी विनम्र भाव से प्रयत्न कर रही हूँ. उम्मीद है किसी की भावना आहत ना होगी.

हाँ, तो मैं कह रही थी कि विवाह की संपूर्ण प्रक्रिया कई चरणों में संपन्न होती है. मोटे तौर पर वे चरण हैं-
  • सुयोग्य वर- वधू की तलाश 
  • छेंका, रोक्का अथवा अंगूठी पहनाने की रस्म 
  • शुभ तिलकोत्सव 
  • शुभ- विवाह 
  • वर- वधू स्वागत समारोह 
  • हनीमून  
इसके बाद बात प्रथम संस्कार की तरफ मुड़ जाती है. 😜

यूँ तो देखने में ये सिर्फ कुछ चरण हैं, पर इनमें से प्रत्येक अपने आप में बहुत सारी प्रक्रियाओं को समाहित किए हुए है. तो आइये प्रत्येक चरण का पृथक अवलोकन करते है.


1. सुयोग्य वर- वधू की तलाश:- 

यह प्रक्रिया कभी ख़त्म ना होनेवाली खोज जैसी लगती है. हालांकि आस-पास हो रहे सैकड़ो विवाह समारोहों को देखकर तो यही लगता है कि यह एक आसान कार्य होगा, तभी इतने लोगों की जोड़ियां मिली; पर वो जोड़ीदार ज्यादातर मामलों में ऐसे रहते हैं, मानों योग्य साथी ना मिलने की स्थिति में समझौता कर रहें हों. कुछ मामलों में अवश्य 'चाँद- सूरज की जोड़ी' वाला केस रहता है, बाकी में "और बेहतर मिल सकता/सकती था/थी" वाला केस रहता है. 

मेरे हिसाब से ऐसी मनोस्थिति तब आती है, जब लोग स्वयं का आकलन किए बिना 'डिमांड' और अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा रख लेते हैं. और कुछ जोड़ियां वाकई बेमेल होती हैं. 

हमारे यहाँ प्राचीनकाल से ही स्वयंवर की प्रथा रही है. सीता- स्वयंवर के आयोजन का उद्देश्य भी यही था कि सीता से कम योग्य वर से उनका विवाह ना हो. सीताजी शिवजी का धनुष उठा पाने में सक्षम थीं. यह कार्य कोई और ना कर पाता था. अतः उनका विवाह एक ऐसे वर से ही हो सकता था, जो शिवजी का धनुष उठा पाने में सक्षम हो. 

सम्पूर्ण रामायण में सीता- स्वयंवर मेरा सर्वप्रिय प्रसंग है, क्योंकि यह घटना प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाती है कि विवाह हेतु कन्या एवं वर को सामान रूप से सामर्थ्यवान होना चाहिए. यह कथा प्रतीकात्मक रूप से बेमेल विवाह का विरोध भी करती है. ये कथा यह भी दर्शाती है कि कन्या का विवाह उस से कम योग्य वर से करना शास्त्र- सम्मत नहीं है. 

मुझे आज के युग में यह कथा और भी प्रासंगिक लगती है, जब दहेज़ प्रथा की वजह से सुयोग्य किन्तु गरीब कन्या का विवाह उस से बहुत कम योग्य वर के साथ होते देखती हूँ. 

स्त्री के मान- सम्मान की स्वरचित आधुनिक परिष्कृत परिभाषा को मुखर रूप से व्यक्त करने वाली स्वाभिमानिनी अपराजेय ध्रुवस्वामिनी के देश को सीता- स्वयंवर- प्रसंग से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है. 

आधुनिक भारतीय समाज में विवाह के प्रथम चरण का वर्णन करते हुए रामायण का एक और संवाद याद आता है; जिसका सार है:- "विवाह दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो कुटुम्बों का मिलन होता है."  

अब यह कुटुम्बों का मिलन अपने- आप में एक जटिल प्रक्रिया है. जब एक घर में, एक ही परिवेश में पले- बढ़े मुठ्ठी भर व्यक्तियों में मतांतर हो जाता है; तो यहाँ तो दो खानदानों के एक बड़े समूह को आपस में मिलाना होता है. मतभेद तो स्वाभाविक है. कभी- कभी यही मतभेद मनभेद में बदल जाता है और मोतीचूर चकनाचूर होने की नौबत आ जाती है

हाँ, तो योग्य वर- वधू को मिलाने में रिश्तेदार अहम भूमिका का निर्वाह करते हैं. घर में लड़की या लड़का के बालिग होने के पहले से ही ये लोग या तो टोकना शुरू कर देते हैं कि कब होगी शादी, अथवा अजीबोगरीब रिश्ते सुझाना शुरू कर देते हैं. तर्क ये होता है कि अभी से 'छेंक' लो, इस से पहले की कोई और 'छेंक' ले. सलाह देनेवाले ऐसे अति- उत्साही लोगों को 'अगुआ' कहते हैं, जो सहर्ष बिचौलिए की भूमिका अदा करने को तैयार रहते हैं. मुझे तो लगता है इसके पीछे मूल भावना आपके ऊपर एहसान लादना होता है कि मैंने आपके बच्चे की शादी कराई, बदले में आप भी मेरे लिए कुछ करो. 

कुछ 'अगुआ' खैर निःस्वार्थ भाव से काम करते है. उन्हें लगता है कि रिश्ते जोड़वाना पुण्य का काम है. पुण्य कमाने की इस धुन में उनकी नज़रे सदैव लड़के- लड़कियों पर टिकी रहती हैं और कल्पनाओं में उन्हें सिर्फ 'सुयोग्य सुमेल' यानि 'परफेक्ट मैच' दिखते रहता है. मुझे तो डर लगता है कि कहीं उनकी बाज़ नज़र 'पानीपुरी' के ठेले पर हँस- हँस कर स्वाद लेती लड़की और दाँत निपोरे ठेलेवाले पर पड़ गई तो वहाँ भी 'परफेक्ट मैच' ना घोषित कर दें; आखिर इनकी सक्रियता शादी- विवाह समारोहों में कुछ ज्यादा ही बढ़ी रहती है. 

कुछ अगुआ तो वर या कन्या के रास्ते से 'कांटा' हटाने के लिए उस 'तथाकथित कांटे' का 'टांका' किसी और से भिड़ाने का बीड़ा लिए घूमते हैं. वो अपनी खुली हुई चुटिया तभी बाँधते हैं,जब लक्षित कार्य संपन्न हो जाता है. 
अलग- अलग भेष में ऐसे अगुआ मुझे सर्वव्याप्त नज़र आते हैं. 


प्रेम- विवाह की स्थिति में अगुआ लोगों को अपने अस्तित्व पर संकट नज़र आने लगता है और वो लोग ऐसे विवाह का विरोध कभी खुलकर तो कभी दबी ज़ुबान में करते हैं. 

संचार- साधनों के विकास के साथ- साथ 'वर्चुअल अगुआ' अर्थात 'मैट्रिमोनियल- साइट्स' का बाजार में पदार्पण हुआ. हज़ारो की तादाद में सुमेल शादियाँ कराने का दावा करने वाले ये 'वर्चुअल अगुआ' भी मानव अगुआ के समान हीं प्रतीत होते है क्योंकि यहाँ भी बढ़ा- चढ़ा कर सूचनाएँ लिखी जाती हैं और लोग बहुत अच्छे होने का अभिनय करते हैं. हालांकि अपने आस- पास कोई शादी होते देखा नहीं है मैंने इस अगुआ के माध्यम से, तो व्यक्तिगत राय अभी सीमित है. 

खैर, प्रेम विवाह हो अथवा अगुआ के सहयोग से माता- पिता द्वारा तय किया गया विवाह; सुयोग्य वर- वधू की खोज (अथवा सुयोग्य कहे जा सकने योग्य वर- वधू की खोज) पूरी होते हीं विवाह- संस्कार की ओर अग्रसरित पहला चरण पूरा होता है. 

नोट- विवाह संस्कार के अगले चरणों की बात अगले रविवार के पोस्ट में होगी. एक ही बार में काफी लम्बा पोस्ट पढ़ने में बोरियत हो सकती है.
इसके अलावा विवाह जैसी जटिल प्रक्रिया पर धीमी गति से चर्चा में ही आनंद आएगा.
आप नीचे कॉमेंट- सेक्शन में अवश्य बताएं कि आपको यह पोस्ट कितना प्रासंगिक लगा. यह भी बताएं कि सबसे मजेदार कौन सा वाक्य लगा. अपने अनुभव भी साझा करें.
मेरा उद्देश्य किसी की भावनाएँ आहत करना कतई नहीं है. एक स्वस्थ मनोरंजन के उद्देश्य से अपना नजरिया बता रही हूँ.
    
 
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