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Wednesday, January 28, 2026

एक थी मानव सभ्यता 



पात्र परिचय
  1. अरावली पर्वत ( a girl dressed up like Arawali Hills, mostly green towards head depicting biodiversity and earthy brownish towards legs depicting mining)
  2. हिमालय पर्वत (a girl dressed up like Himalaya, mostly white towards head depicting snow and dark brownish towards legs depicting mountain)
  3. खनन माफिया - 3 लोग 
  4. केंद्रीय मंत्री
  5. केंद्रीय मंत्री के सेक्रेटरी 
  6. पर्यावरणविद 
  7. प्रोफेसर 
  8. छात्र नेता
  9. लोकल लीडर/ (स्थानीय नेता)
  10. 4 छात्र 

Scene 
(अरावली और हिमालय अपनी- अपनी  जगह पर चुपचाप खड़े हैं. तीनों खनन माफिया अरावली की खुदाई कर रहे हैं. पर्यावरणविद, प्रोफेसर, छात्र नेता, स्थानीय नेता, 4 छात्र “खनन माफिया हाय हाय” कहते हुए मंच पर आते हैं। उनके हाथ में "अरावली बचाओ" और #SaveEnvironment के पोस्टर हैं.) 

लोकल लीडर – हम यहाँ धरने पर बैठेंगे। जब तक केंद्रीय  मंत्री आकर हमें जवाब नहीं देते, हम यहाँ से नहीं हिलेंगे। मैं तो स्थानीय नेता हूँ. पर अब हमारी इस लड़ाई में प्रोफेसर साहब, देश के जाने माने पर्यावरणविद, छात्र नेता एवं छात्र सहयोगी हमारे साथ हैं. 
छात्र नेता- ya ya, we will follow democratic method. Our generation is very like enthu about protecting environment.
सबलोग एक साथ - “खनन माफिया हाय हाय”
(प्रोफेसर सबको शांत रहने का इशारा करते हैं)
प्रोफेसर - हमारी लड़ाई किसी खास खनन माफिया से नहीं है बल्कि हमारा उद्देश्य पर्यावरण को सुरक्षित करना है.
पर्यावरणविद - हां, हमारा पूरा ecosystem तबाह हो जाएगा अगर हम अरावली को नहीं बचा पाएंगे. 

(तभी अरावली भी बोल पड़ती है.)

अरावली – “क्या बच्चों, बचा पाओगे मुझे? बल्कि ये कहना चाहिए कि क्या बचा पाओगे खुद को?”

Student 1- OMG, The Aravali herself is speaking.
Student 2- Unbelievable, let's take a selfie. 
Student 3- yesssss, let's make a story. 

(सभी छात्र अरावली के साथ फोटो खींचने लगते है)

Student 4- we will go viral #Save environment

(पर्यावरणविद, प्रोफेसर और स्थानीय नेता छात्रों को देखकर अफसोस से सिर हिलाते हैं. प्रोफेसर छात्रों को खींचकर पीछे ले जाते हैं.)

पर्यावरणविद - प्रकृति जब स्वयं मनुष्य से बात करने लगे तो समझ जाना चाहिए कि प्रलय का दिन आनेवाला है. अरावली, हम आपको बचाने का प्रयत्न कर रहे हैं.

(तभी वहां केंद्रीय मंत्री आते हुए दिखते हैं .)

सबलोग एक साथ- मंत्रीजी आ गए, देखो देखो, मंत्रीजी आ गए. उनकी सेक्रेटरी भी साथ आईं हैं.
लोकल लीडर - मंत्रीजी, जिंदाबाद. मंत्रीजी जिंदाबाद 

(मंत्रीजी अरावली को दंडवत प्रणाम करते हैं)
केंद्रीय मंत्री - माता अरावली, आपका ये प्रकृति प्रेमी पुत्र आपकी सुरक्षा अवश्य करेगा. हमारी सरकार पर्यावरण की सुरक्षा को सदैव तत्पर है. हम पूर्ण प्रबंध कर रहे हैं कि...

(अरावली मंत्री की बात बीच में ही काट देती है.)

अरावली (गुस्से से) - पूर्ण प्रबंध! हुह! मेरे अंग-प्रत्यंग को काट-काटकर नष्ट कर चुके हो तुम, और अब पूर्ण प्रबंध करोगे. 
केंद्रीय मंत्री- देखिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ...

(अरावली फिर से मंत्री की बात बीच में ही काट देती है.)

अरावली (गुस्से से)- अरे तुम्हारी सर्वोच्च न्यायालय मुझे नाटी बोल रही है. मैं क्या complain पीऊंगी? 100 मीटर से कम हाइट हुई तो काट दोगे ?
पर्यावरणविद- हां, और संसार में किसी भी पर्वत चोटी की ऊंचाई मापने का जो standard तरीका है वो ये है कि पर्वत चोटी की ऊंचाई समुद्र तल से मापी जाती है ना कि सतह से. अरावली की सतह already समुद्र तल से 250 मीटर ऊपर है. इस हिसाब से अरावली की कोई पहाड़ी 100 मीटर से कम नहीं हुई. 
Student 1- Yes, मैंने पढ़ा है. Mount Everest की height 8,848 meters है from sea level, not from earth surface.
अरावली (गुस्से से) - लो कर लो बात, तुम्हारी सर्वोच्च न्यायालय ठीक से भूगोल भी न पढ़ पाई.
छात्र नेता:- I am little confused now. Problem क्या है? The Supreme Court in its judgment itself says, " the Aravali Hills and Ranges harbour rich biodiversity, with twenty-two wildlife sanctuaries, four tiger reserves, the Keoladeo National Park, along with wetlands like Sultanpur, Sambhar, Siliserh, and Asola Bhati, and aquifers that recharge river systems including the ones at Chambal, Sabarmati, Luni, Mahi, and Banas, it is more than appropriate that before permitting further sustainable mining activities, the same are preceded by preparation of an MPSM."

अरावली – ये जो अंग्रेजी के अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया है तुमने किया है ना बेटा, बहुत अच्छा… वाह शैम्पी वाह!
“Sustainable mining”… हुह 
अपने नेताजी का मोटा पेट काट दो... Sustainable figure maintenance... Huhh
अरे मैं अरावली हूँ. संस्कृत के दो शब्दों—'अरा' यानि पहाड़ की धार और 'वली' यानि रेखा/पंक्ति से मिलकर बना है मेरा नाम. सीधा मतलब - पर्वत श्रृंखला. मैं भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला हूं जो गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हूँ. तुम्हारा राष्ट्रपति भवन भी मेरे ऊपर ही बना है. मेरे बिना गुजारा नहीं है तुम्हारा.

(तभी  हिमालय भी बोल पड़ता है)
हिमालय:- अरावली दीदी सही कह रही है. इन्हीं की वजह से तुम सब थार रेगिस्तान की बालू भरी हवाओं से बचे हुए हो. अगर अरावली दीदी नहीं रहेगी तो मुझ तक इतनी गर्मी पहुंचेगी कि मेरी सारी बर्फ पिघल जाएगी. कोई नहीं बचेगा. 

(सारे students मुंह फाड़ कर हिमालय को देख रहे थे)
Student 1- Bro, पहले अरावली, Now हिमालय is speaking. I think we have done great job for environment.
Student 2- yessss bro, that's the reason every mountain is talking to us.
Student 3- Bro, I have a feeling. We might get some award for saving environment.
Student 4- yaar, सच्ची बताओ, हमलोग तो lecture bunk करने के लिए protest attend करने आ गए थे. अब award ही मिल जाएगा.

प्रोफेसर- चुप, एकदम चुप, पीछे हटो. इस generation के लिए तो environment को protect करना बेकार ही है.

(तभी वहां खनन माफिया और उनके लोग आ जाते हैं.)

लोकल लीडर- खनन माफिया हाय हाय. हम अरावली की खुदाई नहीं होने देंगे. संपूर्ण अरावली क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अनुसार कंजर्वेशन रिजर्व या कंजर्वेशन कॉरिडोर  या पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिए.

खनन माफिया 1- हमारे पास Sustainable Mining का लाइसेंस है, तो हम तो काटेंगे.
खनन माफिया 2- और नहीं तो क्या ? तुमलोग रटते रहो पर्यावरण पर्यावरण, हम तो अपनी जेब भरेंगे. 
खनन माफिया 1- सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया न uniform definition... 100 मीटर से कम ऊँचाई के जो जो पहाड़ हैं, अब काटे जाएंगे. (जेब से इंची टेप निकाल कर अरावली को मापता है.) देखो, 99 मीटर है ऊंचाई इस पहाड़ की. हम तो काटेंगे इसको. 
खनन माफिया 2- दिल्ली से permission लेके आ गए हमलोग, क्यों नेताजी. यहाँ बैठे धरना कर रहें हैं ई ससुर. 
अरावली- (गुस्से से चिल्लाती है) - बेटा, तुमलोग जो मुझे नाटा बोलकर काटने चले हो, अपने बॉलीवुड में सिर्फ़ अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण को ही रखोगे क्या? बाक़ी सबको काट दोगे क्या?
बड़े आए! हमारा कुत्ता कुत्ता, तुम्हारा कुत्ता टॉमी. हमारा पहाड़ - नाटा. तुम्हारा घोटाला - नीति.

(वे लोग हथौड़ा से अरावली को लगातार ठोकते रहते हैं. कोई नहीं रुकता. अरावली दर्द से कराहती है और धीरे धीरे गिरने लगती है)
 प्रोफेसर:- ये गलत हो रहा. Uniform definition के नाम पर ये जो 100 मीटर से कम ऊँचाई के पहाड़ काटे जा रहे हैं, गलत है.
पर्यावरणविद:- सेक्रेटरी साहिबा, जरा इस रिपोर्ट को आप ही पढ़ कर बताइए. पढ़िए, पढ़िए. 
सेक्रेटरी (हिचकते हुए)- राजस्थान में अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई
1,07,494 पहाड़ियां- 20 मीटर तक
12,081 पहाड़ियां - 20 मीटर से ऊपर
5,009 पहाड़ियां- 40 मीटर से ऊपर
2,656 पहाड़ियां- 60 मीटर से ऊपर
1,594 पहाड़ियां- 80 मीटर से ऊपर 
सिर्फ 1,048 पहाड़ियां- 100 मीटर से ऊपर

पर्यावरणविद- ये सिर्फ राजस्थान का data है. बाकी तीन राज्यों का data भी ऐसे ही alarming है. 
हिमालय – कोई भी आंकड़ा जितना खतरा बता रहा है, उस से ज्यादा खतरनाक है अरावली पर्वतमाला का कटना. अरावली दीदी के हटते ही मैं भी पिघल जाऊँगा. 
तो अब एक तरफ़ से झेलो थार रेगिस्तान की रेत और दूसरी तरफ़ से हिमालय के पिघले ग्लेशियर का प्रवाह.

सब लोग – बचाओ बचाओ, बहुत रेत है, कुछ दिख नहीं रहा.
मुँह में बालू आ रही है, साँस नहीं आ रही.

सब लोग – अरे, इधर देखो, बहुत तेज़ी से पानी बह कर आ रहा है, हम डूब रहे हैं.
त्राहिमाम! त्राहिमाम!

Student 2- Let's take one final selfie.

हिमालय- अलविदा मानव सभ्यता.
अरावली – ये तुच्छ मनुष्य स्क्रिप्ट लिखने चले थे – “एक थी अरावली”
इनका बन गया – “एक थी मानव सभ्यता”

🖊️ प्राची 

Friday, January 16, 2026

 “नूह का कबूतर”: एक सुंदर किताब 


साल 2026 की एक सुंदर शुरुआत हुई. “नूह का कबूतर” पढ़ने की चाह थी. दोस्त को अपनी चाहत बताई थी कि खरीदनी है. आज सत्र के पहले दिन ये सारी चीजें उपहार स्वरूप प्राप्त हुई. खिली हुई बांछे और जल्दी जल्दी सारी चिट्ठियों को पढ़ने की बेचैनी एकसाथ मेरे चेहरे पर नजर आई. घर आकर सबसे पहले दीदी को फोन किया और बाबुषा कोहली की पाती पढ़कर सुनाया. फिर ईदगाह के हामिद को लिखा पैगाम पढ़ा. अब पढ़ने की जल्दी से ज्यादा स्थिरता का अनुभव हो रहा. ये जल्दी जल्दी पढ़कर खत्म कर देने वाली किताब नहीं है बल्कि स्थिर मन से बैठकर आहिस्ता आहिस्ता ग्रहण करने लायक ग्रंथ है. एक एक किरदार के जीवन के उतार चढ़ाव को शब्दों के माध्यम से सब्र के साथ देखने की कवायद है ये किताब.

हम चिट्ठियों के जमाने के ही तो हैं. लैंडलाइन फोन पर तफसील से बात नहीं हो पाती थी. मोबाइल का पदार्पण जीवन में बहुत बाद में हुआ. अपना बचपन चिट्ठी पाती के भावात्मक संदेशों से घिरा हुआ था. कभी फूआ की चिट्ठी कभी मौसी की पाती. कभी खुशखबरी लाते, कभी जीवन की परेशानियाँ बयान करते खत. उनका जवाबी पैगाम लिखने की कवायद. लिफाफे, अन्तर्देशीय इत्यादि पर लिखे गए संदेश. कम शब्दों में ज्यादा बयां करने की कला सिखाते पत्र.

पत्रिकाओं में पढ़कर पेन फ्रेंड का कांसेप्ट सीखा था. मेरा कोई पेन फ्रेंड कभी नहीं रहा पर उन दिनों बहुत मन होता था कि काश हामिद का पता मिल जाता तो उस से पत्र व्यवहार होता. हलकू से बात करने की इच्छा होती थी और उसके जबरा से भी. इच्छा होती थी उन नीलगायों को अनुनय विनय भरा संदेश भेजने की कि हलकू का खेत ना खाओ. असंख्य किरदार जो बचपन में टकराए थे और जिनसे पत्र व्यवहार करने की इच्छा थी और जो इच्छा अबतक पूरी ना हो पाई थी क्योंकि उन किरदारों का पता नहीं था मेरे पास.

“नूह का कबूतर” ने ये सिखाया कि पत्र तो बिना पते के भी लिखे जा सकते हैं. अपना संदेश अपने प्रिय किरदार तक पहुंचाने की चाह हो तो पते का लापता होना आड़े नहीं आता.

“नूह का कबूतर” = मधुर पातियों को सहेजे एक सुंदर किताब. 

शुक्रिया विकास रावल जी मुझ तक यह उपहार भेजवाने के लिए.

शुक्रिया प्रगति राज जी मुझ तक यह उपहार बोनस के साथ यानि मेरा नाम खुदे कलम के साथ लाने के लिए.  

हिंदीस्थान प्रकाशन एवं संकलन कर्ता आमिर हमजा जी मोबाइल के जमाने में हमें चिठ्ठियों तक ले जाने के लिए

 साधुवाद.


✒ प्राची

Tuesday, December 30, 2025

अलविदा 2025



ईश्वर की कृपा से एक और साल सही सलामत गुजर गया. कुछ सीख, कुछ खुशियां और नई आशाएं देकर गया ये साल 2025. दिसंबर के कोहरे भरे दिन और ठिठुरन भरी रातों के बीच हर साल ऐसे हीं चुपके से विदा लेना चाहता है और हम मनुष्य कुछ उठा नहीं रखते उसकी शांतिपूर्ण अलविदा को कोलाहल से भर उठाने में. हालांकि समय का पाबंद ये साल हमारे काउंट डाउन के बिना भी ठीक 31 दिसंबर को विदा ले हीं लेगा. ये तो कभी नहीं सुना कि घने कोहरे की वजह से जानेवाले साल की ट्रेन या फ्लाइट कैंसिल हो गई या डिले हो गई.
लेटलतिफी हम मनुष्यों का शगल है. समय तो समय का पाबंद होता है.
काफी समय से 2025 ▶️ 2026 के पोस्ट सोशल मीडिया पर देख रही हूँ. अपनी लेटलतिफी की वजह से अभी तक कुछ लिखा नहीं था पर आज ठिठुरन भरी शाम में एक गज़ल सुन लिया, "है कुछ उस पार मेरा भी, है कुछ इस पार तेरा भी..." सुनकर पहले रुलाई आई, फिर मुस्कुराहट. पता नहीं क्यों इन शब्दों ने बड़ी राहत दी. शब्दों से हीं तो संचालित होती हूँ मैं. इतनी काबिलियत तो अबतक नहीं आई कि इन शब्दों को साशय स्पष्ट कर सकूं, पर इस गज़ल ने बड़ी राहत दी. तब से अबतक लूप पर यही गज़ल सुन रही हूँ. 
सोचा 2025 को अलविदा इसी गज़ल से बोल दूं. साल 2025 की सीमा रेखा के उस पार साल 2026 में है कुछ मेरा भी...

Sunday, September 14, 2025

हिन्दी है तो मैं हूँ 


आज हिन्दी दिवस है.
आज हीं के दिन संविधान सभा ने ये निर्णय लिया था कि हिन्दी हमारी आधिकारिक भाषा होगी, इसीलिए ये दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है; ये बात हम सबको मालूम है.
सुबह से शुभकामना संदेश प्राप्त हो रहे हैं. 
इन संदेशों में सिर्फ एक संदेश ऐसा प्राप्त हुआ है जिसमें बिना किसी लाग लपेट, बिना किसी राग द्वेष के सिर्फ हिन्दी दिवस की शुभकामना है. मन प्रसन्न हुआ शुद्ध रूप से हिन्दी दिवस को समर्पित ये संदेश पढ़कर.
अधिकतर संदेशों और Social Media पर लगाए गए status को पढ़कर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो कोई जंग छिड़ी हुई है हिन्दी की दूसरी भाषाओं के साथ; मानो फलां भाषा ने हिन्दी भाषा को बड़ी दयनीय स्थिति में पहुंचा दिया है; मानो दूसरी भाषा को कोसे बिना हिन्दी दिवस के मायने खत्म हो जाएंगे.
क्यों?
ये प्रतिस्पर्धा हमारे दिमाग की उपज है. भाषाएं हमारी अभिव्यक्ति का साधन हैं. जितनी ज्यादा भाषाओं में हम खुद को अभिव्यक्त कर पायेंगे उतना अच्छा होगा. पृथ्वी के उतने स्थानों पर घूमने में उतनी आसानी होगी. ये भी कहते हैं कि ज्यादा भाषाएं जानने से मानसिक विकास भी ज्यादा होता है.
तो, अपनी भाषा को गले लगाइए, उसे प्यार कीजिए, उसका सम्मान कीजिए किंतु किसी और भाषा से तुलना करके उसका अपमान मत कीजिए.
जब ब्रह्मांड की कोख में हर रंग रूप जाति नस्ल के मनुष्य; हर प्रजाति के जीव; हर किस्म की जलवायु और हर भौगोलिक विविधता के लिए स्थान है तो हम अपने मस्तिष्क में भाषाई विविधता के स्थान तो बना ही सकते हैं.
यकीन मानिए, विविध भाषाओं को जानकर हम विविध संस्कृतियों का अध्ययन कर सकते हैं, विविध सिनेमा का लुत्फ़ उठा सकते हैं और सतरंगी साहित्य का आनंद ले सकते हैं.
अतएव हिन्दी दिवस मनाने का ये कतई मतलब नहीं है कि बाकी भाषाओं को कोसा जाए. वैश्वीकरण के दौर में हर भाषा की अपनी उपयोगिता है. बल्कि यूं कहें कि जरूरत है. एक भाषा से सारे काम नहीं हो सकते. एक भाषा पर सारे कामों का बोझ डालना ठीक भी नहीं है. जिस भाषा में सिनेमा देख कर मजा आता है, जिस भाषा में साहित्य पढ़कर मजा आता है, जिस भाषा में अपने मन की बात ज्यादा अच्छी तरह कह पाते हैं उस भाषा में ये सारे काम कर लेंगे और जो भाषा पासपोर्ट पर लिखने की है उससे वो काम ले लेंगे. उपयोगितानुसार काम बाँट लेंगे तो झगड़ा खत्म हो जाएगा. हां, कोई खास भाषा न आने पर खुद को हीन समझना गलत है. 
 
अब आती हूँ हिन्दी भाषा से मेरे संबंध पर. वैसे तो मेरी मातृभाषा भोजपुरी है पर मेरे जीवन में भोजपुरी और हिन्दी का आगमन साथ साथ हुआ तो मातृभाषा का दर्जा हिन्दी को भी प्राप्त है.
जब कलम उठाई और क, ख, ग़ लिखना सीखा तो पहली रचना हिन्दी में ही लिखी और अबतक ज्यादातर हिन्दी में ही लिखती आ रही हूँ. अन्य भाषा का ज्ञान होने के बावजूद मेरी अभिव्यक्ति का सबसे सुविधाजनक माध्यम हिन्दी हीं है. मेरे उल्लास, दुःख, क्रोध, प्रेम इत्यादि हर भाव की अभिव्यक्ति का प्रमुख प्रमाणिक साधन हिन्दी ही है. सिनेमा सबसे ज्यादा हिन्दी में ही देखा है. साहित्य सबसे ज्यादा हिन्दी में ही पढ़ा है. कुछ अंग्रेजी में नहीं तो अन्य भाषा की हुई तो अनुदित कृति पढ़ी है. इस भाषा ने घर बैठे मुझे विश्व भ्रमण कराया है. मनुष्य होने का दर्जा हिन्दी ने दिलाया है मुझे. अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 को अमल में लाकर दिया है हिन्दी भाषा ने मुझे.
मैं अभिव्यक्त कर पाती हूँ इसीलिए मैं हूँ.
हिन्दी है तो मैं हूँ.


Saturday, September 13, 2025

रसोड़े से हमारा कुछ ऐसा नाता है 🥲☹️


रक्षा बंधन के दिन सबसे बड़ी दीदी ने सलाह दी कि सिर्फ इतवार नहीं, सप्ताह के बाकी दिन भी हरी सब्जियां खासकर करेला खाया करो. 
दीदी की बात मानते हुए जोश जोश में सोमवार को हीं श्री श्री Blinkit जी की सेवाएं ली और स्वभाव से अमधुर करेला जी का पदार्पण घर में हो गया. 

जिस जोशो खरोश से करेला जी का आगमन हुआ था, आज यानी शनिवार आते आते उतने हीं निर्विकार भाव से (किंतु माता अन्नपूर्णा से क्षमा माँगते हुए) इनको dustbin को अर्पित करना पड़ा. 

Buying green vegetables on Monday and throwing them in the dustbin on Saturday is a new form of adulting, I guess.
 (Never intended to disrespect the food.) 

रसोड़े से हमारा कुछ ऐसा नाता है 🥲☹️

✒ Prachi 

 

Friday, September 5, 2025

 HAPPY TEACHER'S DAY


It’s been 3 years officially.
And every single time I see confused faces transform into enlightened ones — I feel it's worth it.
Every time a former student messages me to say I’ve impacted her life — I know it's worth it.
Every lecture leaves me elated.
I smile as I watch my life come full circle:
From participating in a Moot court to judging one.
From volunteering at a Moot to organizing it.
From being a student- volunteer of the Legal Aid Clinic to becoming its Faculty Incharge.
Yes — the journey from student to teacher is beautiful.
And it's absolutely worth it.
Thank you, my dear students.
In the chaos of projects- submissions, presentations, and exams — you still find time to share your thoughts with me.
Whether through handwritten letters or heartfelt messages, you remind me why I chose this path.
These words...They are the oxygen I breathe.
Thank you, my darlings, for being there.
Happy Teacher’s Day to me.

Thursday, August 14, 2025

 आज़ादी मुबारक 



कुछ परंपराएं बहुत खूबसूरत होती हैं. इन्हीं खूबसूरत परंपराओं में से एक है स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का राष्ट्र के नाम संदेश. देश के अभिभावक का संबोधन देशवासियों के नाम. 
मैं बचपन से ये संदेश सुनती आ रही हूँ. तब से जब समझ में कुछ नहीं आता था. ये अलग बात है कि भाव विह्वलता के अतिरेक में बातें अब भी दिमाग से ज्यादा दिल तक पहुंचती हैं. लेकिन एक बात है जो हर बार खूब अच्छे से समझ आई है और वो है एक खुशनुमा एहसास. #Feelgood 
बचपन में हम रेडियो पर सुना करते थे, बाद में टीवी पर और अब YouTube पर. सुनने या देखने के साधन अब ज्यादा उपलब्ध हैं. रेडियो या टीवी के साथ एक अनुशासन होता था कि अगर छूट गया तो छूट जाएगा. अब हाथ में मोबाइल, टैब और लैपटॉप है तो सुरक्षा का भाव रहता है कि अगर छूट गया तो फिर देख सुन लेंगे, लेकिन छूटता नहीं है. अच्छी बात है कि अबतक ये अनुशासन बना हुआ है. 
सोचती हूँ इस अनुशासन के पीछे क्या भाव हो सकता है. राष्ट्रप्रेम अपनी जगह है, लेकिन शायद कृतज्ञता का भाव ज्यादा है. ज़िंदगी से कृतज्ञता इस बात की कि मैं एक आज़ाद देश में पैदा हुई, कि मेरा संविधान मुझे मूलभूत अधिकार देता है, कि मेरा कानून मुझे स्त्री होने का विशेषाधिकार प्रदान करता है, कि मुझे अभिव्यक्ति की आज़ादी है, कि मैं स्वतंत्र हूँ, कि मैं स्वच्छंद हूँ, कि मैं भारतीय हूँ.

शुक्रिया ज़िंदगी 

हर बार राष्ट्रपति के मुंह से "मेरे प्यारे देशवासियों" संबोधन सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. लगता है देश को मैं प्यारी हूँ. मुझे तो मेरा देश प्यारा है हीं.
जब राष्ट्रपति के संबोधन में देश की उपलब्धियां गिनाई जाती है तो मैं गौरवान्वित हो उठती हूँ. जब अतीत की गलतियों से सीख लेने की बात आती है तो मैं मन ही मन सजग होकर प्रण लेने लगती हूँ कि कम से कम अपनी तरफ से कोई गलती नहीं करूंगी. जब देश की समस्याओं और आतंक या आपदा पीड़ितों की बात आती है तो देश की साझा पीड़ा से मेरे आंसू लुढ़क पड़ते हैं.
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का यह संबोधन मुझे मेरे देश और देशवासियों से चमत्कारिक रूप से जोड़ता है. आम दिनों में जो शिकायतें सरकारी नीतियों या फैसलों से रहती है वो गायब सी हो जाती है. मन में बस कृतज्ञता का भाव रहता है.
शुक्रिया ज़िंदगी कि मैं स्वतंत्र हूँ, कि मैं स्वच्छंद हूँ, कि मैं भारतीय हूँ.
हम सबको आज़ादी मुबारक.

🖊️ प्राची 

एक थी मानव सभ्यता  पात्र परिचय -  अरावली पर्वत ( a girl dressed up like Arawali Hills, mostly green towards head depicting biodiversity and ...