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Wednesday, June 5, 2024

  घर का दुआर


बालक सा नीम का पेड़ है, जो अपने हिस्से की शीतलता प्रदान करता है, पीछे शमी का पेड़ है जिसको पवित्रता पसंद है, उसके पीछे कनैल के फूल खिले है. इन फूलों को जीवन की सम विषम परिस्थितियों से फर्क नहीं पड़ता, बस निर्विकार भाव से खिल उठते है हर रोज. अब ये हमारी मनोदशा पर निर्भर करता है कि हमें इनका खिलना पुलकित करता है या उदास...

थोड़ी ही दूरी पर मात्र छह माह की आयु का केले का पौधा है. आयु से ज्यादा जिम्मेदारियां निभाता है ये. जिस आयु में मनुष्य का दूध भात होता है, पूजा पाठ के नियमों के पालन से छूट होती है, केले का पौधा उगने के साथ ही ईश्वर की कठिन आराधना में लीन हो जाता है. पीछे गमले में तुलसी माता हैं जिनकी उपस्थिति मानव जीवन को समृद्ध करती है और मृत्यु को भी पूर्ण करती है. मुंह में तुलसी और गंगाजल लेकर ही मनुष्य इस लोक से उस लोक की यात्रा पर निकलता है, दुर्गम सफर सरल हो जाता है तुलसी माता के प्रभाव से ऐसा कहते है.

थोड़ी दूरी पर नन्हा मुन्ना सा आम का पेड़ है. छोटा है तो लाडला है, पर कंधो पर जिम्मेदारियों का बोझ है. बड़े होकर मीठे फल देने ही हैं, ऐसी बातें इसे रोज सुननी पड़ती है. बेचारे की किस्मत मनुष्य के बच्चों जैसी है.

साथ में खड़ा है औषधीय गुणों से भरपूर अर्जुन का पेड़. कहते हैं इसकी पत्तियों के सेवन से हृदय रोग दूर होता है. बाजार में बिकता अर्जुनरिष्ट तो देखा ही होगा, उसका स्त्रोत है ये पेड़. अक्सर ही इसको संग्रहालय में रखे वस्तु के समान भाव मिलता है जब लोग आंखे बड़ी बड़ी करके इसको देखते हैं कि अच्छा अर्जुन नाम का भी पेड़ होता है. ऐसे में बगल में खड़ा नन्हा मुन्ना आम का पेड़ स्वयं की प्रसिद्धि पर गर्व करता है. आखिर सबलोग उसको जानते जो है. अर्जुन जैसा गुमनाम नहीं है आम.

प्रसिद्धि और गुमनामी की इस प्रतिस्पर्धा के बीच भी ये दोनों पेड़ मिलकर पास रखी चौकी पर और चापाकल पर क्षमता भर छांव बनाए रखते हैं.

अर्जुन की पत्तियों से टकराता है जवान हो चुके आम का पेड़, जिसपर फल आने लगे हैं. मीठे मीठे आम, नहीं उस से पहले आता है टिकोला, कैरी या अमिया... जो भी आप कहना चाहें. शुरू होता है चटनी का दौर, कभी पुदीने के साथ तो कभी धनिए के साथ. कसम से जिंदगी गुलज़ार रहती है इन पेड़ों के साथ. बीच बीच में हनुमान जी के दूतों का भी हमला होता रहता है, उस हमले का कोलाहल जीवन की एकरसता खत्म करता है. 

भौतिक चीजों की बात करें तो बेमेल सी कुर्सियां पड़ी हैं, बिल्कुल बेमेल जीवन सी... थोड़ी देर पहले पूरा परिवार इन्ही बेमेल कुर्सियों पर बैठा गरुड़ पुराण सुन रहा था. एक खाट पड़ा है जिसपर बैठ कर यह प्रसंग लिखा गया है. 

साइकिल है, बाइक है, सूखते कपड़े हैं, कुछ ईंटे रखी है, कुदाल है, पुरानी बाल्टी है,अधूरा खाट भी है, अधूरी बनी दीवार भी है... बड़ी ही गंभीरता से जीवन के अधूरेपन को इंगित करती हुई... या शायद ये इंगित करते हुए कि जीवन के लिए आवश्यक इतनी ही चीज़े हैं, ज्यादा तित्तीमा की जरूरत नहीं. हां, कुछ किताबे जरूर चाहिए. 

अक्सर ही यह अधूरापन मुझे सम्पूर्ण लगता है. अक्सर ही लगता है कि सबकुछ पूर्ण हो जाएगा तो जीवन कितना नीरस हो जाएगा...

ये है मेरे गांव वाले घर का द्वार...

मेरे विचार से दर्शनशास्त्र का कोई विद्यार्थी अगर यहां बैठ जाए, तो उसे अपना विषय ज्यादा समझ आएगा. 

दर्शनशास्त्र की विधार्थी न होने के बावजूद भी मैं यहां घंटो बैठ कर बहुत कुछ सोचती हूं. कभी खाट पर लेट जाती हूं तो ऊपर चांद तारों को ताक लेती हूं. इस विशाल ब्रह्मांड में मेरा अस्तित्व कितना छोटा है, इस बात का अंदाजा हो जाता है.

काफी ऐतिहासिक है ये द्वार (दुआर). खानदान के बड़े बुजुर्गों ने बड़ी चर्चाएं की हैं इस दुआर पर. तेज आवाज में बीबीसी न्यूज सुन सुनकर ज्यादा तेज आवाज में घटनाओं पर चर्चा करना हमारे बुजुर्गों का प्रिय शगल था. गप सेंटर नाम हुआ करता था इस दुआर का जब कच्ची मिट्टी का फर्श हुआ करता था और फूस वाली बाउंड्री हुआ करती थी, गाय भी रहती थी और गाय की नाद भी, भूसा रखने का अलग कमरा भी होता था. 

वक्त बदला, हालात बदले, ना गाय रही ना गाय का भूसा वाला कमरा न ही नाद. कच्चा दुआर पक्का हो गया. लेकिन जज्बात आज भी वही हैं इस जगह को लेकर, बल्कि भावनाएं और ज्यादा प्रगाढ़ हीं हुई हैं. 

ये है मेरे घर का दुआर

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