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Tuesday, December 30, 2025

अलविदा 2025



ईश्वर की कृपा से एक और साल सही सलामत गुजर गया. कुछ सीख, कुछ खुशियां और नई आशाएं देकर गया ये साल 2025. दिसंबर के कोहरे भरे दिन और ठिठुरन भरी रातों के बीच हर साल ऐसे हीं चुपके से विदा लेना चाहता है और हम मनुष्य कुछ उठा नहीं रखते उसकी शांतिपूर्ण अलविदा को कोलाहल से भर उठाने में. हालांकि समय का पाबंद ये साल हमारे काउंट डाउन के बिना भी ठीक 31 दिसंबर को विदा ले हीं लेगा. ये तो कभी नहीं सुना कि घने कोहरे की वजह से जानेवाले साल की ट्रेन या फ्लाइट कैंसिल हो गई या डिले हो गई.
लेटलतिफी हम मनुष्यों का शगल है. समय तो समय का पाबंद होता है.
काफी समय से 2025 ▶️ 2026 के पोस्ट सोशल मीडिया पर देख रही हूँ. अपनी लेटलतिफी की वजह से अभी तक कुछ लिखा नहीं था पर आज ठिठुरन भरी शाम में एक गज़ल सुन लिया, "है कुछ उस पार मेरा भी, है कुछ इस पार तेरा भी..." सुनकर पहले रुलाई आई, फिर मुस्कुराहट. पता नहीं क्यों इन शब्दों ने बड़ी राहत दी. शब्दों से हीं तो संचालित होती हूँ मैं. इतनी काबिलियत तो अबतक नहीं आई कि इन शब्दों को साशय स्पष्ट कर सकूं, पर इस गज़ल ने बड़ी राहत दी. तब से अबतक लूप पर यही गज़ल सुन रही हूँ. 
सोचा 2025 को अलविदा इसी गज़ल से बोल दूं. साल 2025 की सीमा रेखा के उस पार साल 2026 में है कुछ मेरा भी...

Sunday, September 14, 2025

हिन्दी है तो मैं हूँ 


आज हिन्दी दिवस है.
आज हीं के दिन संविधान सभा ने ये निर्णय लिया था कि हिन्दी हमारी आधिकारिक भाषा होगी, इसीलिए ये दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है; ये बात हम सबको मालूम है.
सुबह से शुभकामना संदेश प्राप्त हो रहे हैं. 
इन संदेशों में सिर्फ एक संदेश ऐसा प्राप्त हुआ है जिसमें बिना किसी लाग लपेट, बिना किसी राग द्वेष के सिर्फ हिन्दी दिवस की शुभकामना है. मन प्रसन्न हुआ शुद्ध रूप से हिन्दी दिवस को समर्पित ये संदेश पढ़कर.
अधिकतर संदेशों और Social Media पर लगाए गए status को पढ़कर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो कोई जंग छिड़ी हुई है हिन्दी की दूसरी भाषाओं के साथ; मानो फलां भाषा ने हिन्दी भाषा को बड़ी दयनीय स्थिति में पहुंचा दिया है; मानो दूसरी भाषा को कोसे बिना हिन्दी दिवस के मायने खत्म हो जाएंगे.
क्यों?
ये प्रतिस्पर्धा हमारे दिमाग की उपज है. भाषाएं हमारी अभिव्यक्ति का साधन हैं. जितनी ज्यादा भाषाओं में हम खुद को अभिव्यक्त कर पायेंगे उतना अच्छा होगा. पृथ्वी के उतने स्थानों पर घूमने में उतनी आसानी होगी. ये भी कहते हैं कि ज्यादा भाषाएं जानने से मानसिक विकास भी ज्यादा होता है.
तो, अपनी भाषा को गले लगाइए, उसे प्यार कीजिए, उसका सम्मान कीजिए किंतु किसी और भाषा से तुलना करके उसका अपमान मत कीजिए.
जब ब्रह्मांड की कोख में हर रंग रूप जाति नस्ल के मनुष्य; हर प्रजाति के जीव; हर किस्म की जलवायु और हर भौगोलिक विविधता के लिए स्थान है तो हम अपने मस्तिष्क में भाषाई विविधता के स्थान तो बना ही सकते हैं.
यकीन मानिए, विविध भाषाओं को जानकर हम विविध संस्कृतियों का अध्ययन कर सकते हैं, विविध सिनेमा का लुत्फ़ उठा सकते हैं और सतरंगी साहित्य का आनंद ले सकते हैं.
अतएव हिन्दी दिवस मनाने का ये कतई मतलब नहीं है कि बाकी भाषाओं को कोसा जाए. वैश्वीकरण के दौर में हर भाषा की अपनी उपयोगिता है. बल्कि यूं कहें कि जरूरत है. एक भाषा से सारे काम नहीं हो सकते. एक भाषा पर सारे कामों का बोझ डालना ठीक भी नहीं है. जिस भाषा में सिनेमा देख कर मजा आता है, जिस भाषा में साहित्य पढ़कर मजा आता है, जिस भाषा में अपने मन की बात ज्यादा अच्छी तरह कह पाते हैं उस भाषा में ये सारे काम कर लेंगे और जो भाषा पासपोर्ट पर लिखने की है उससे वो काम ले लेंगे. उपयोगितानुसार काम बाँट लेंगे तो झगड़ा खत्म हो जाएगा. हां, कोई खास भाषा न आने पर खुद को हीन समझना गलत है. 
 
अब आती हूँ हिन्दी भाषा से मेरे संबंध पर. वैसे तो मेरी मातृभाषा भोजपुरी है पर मेरे जीवन में भोजपुरी और हिन्दी का आगमन साथ साथ हुआ तो मातृभाषा का दर्जा हिन्दी को भी प्राप्त है.
जब कलम उठाई और क, ख, ग़ लिखना सीखा तो पहली रचना हिन्दी में ही लिखी और अबतक ज्यादातर हिन्दी में ही लिखती आ रही हूँ. अन्य भाषा का ज्ञान होने के बावजूद मेरी अभिव्यक्ति का सबसे सुविधाजनक माध्यम हिन्दी हीं है. मेरे उल्लास, दुःख, क्रोध, प्रेम इत्यादि हर भाव की अभिव्यक्ति का प्रमुख प्रमाणिक साधन हिन्दी ही है. सिनेमा सबसे ज्यादा हिन्दी में ही देखा है. साहित्य सबसे ज्यादा हिन्दी में ही पढ़ा है. कुछ अंग्रेजी में नहीं तो अन्य भाषा की हुई तो अनुदित कृति पढ़ी है. इस भाषा ने घर बैठे मुझे विश्व भ्रमण कराया है. मनुष्य होने का दर्जा हिन्दी ने दिलाया है मुझे. अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 को अमल में लाकर दिया है हिन्दी भाषा ने मुझे.
मैं अभिव्यक्त कर पाती हूँ इसीलिए मैं हूँ.
हिन्दी है तो मैं हूँ.


Saturday, September 13, 2025

रसोड़े से हमारा कुछ ऐसा नाता है 🥲☹️


रक्षा बंधन के दिन सबसे बड़ी दीदी ने सलाह दी कि सिर्फ इतवार नहीं, सप्ताह के बाकी दिन भी हरी सब्जियां खासकर करेला खाया करो. 
दीदी की बात मानते हुए जोश जोश में सोमवार को हीं श्री श्री Blinkit जी की सेवाएं ली और स्वभाव से अमधुर करेला जी का पदार्पण घर में हो गया. 

जिस जोशो खरोश से करेला जी का आगमन हुआ था, आज यानी शनिवार आते आते उतने हीं निर्विकार भाव से (किंतु माता अन्नपूर्णा से क्षमा माँगते हुए) इनको dustbin को अर्पित करना पड़ा. 

Buying green vegetables on Monday and throwing them in the dustbin on Saturday is a new form of adulting, I guess.
 (Never intended to disrespect the food.) 

रसोड़े से हमारा कुछ ऐसा नाता है 🥲☹️

✒ Prachi 

 

Friday, September 5, 2025

 HAPPY TEACHER'S DAY


It’s been 3 years officially.
And every single time I see confused faces transform into enlightened ones — I feel it's worth it.
Every time a former student messages me to say I’ve impacted her life — I know it's worth it.
Every lecture leaves me elated.
I smile as I watch my life come full circle:
From participating in a Moot court to judging one.
From volunteering at a Moot to organizing it.
From being a student- volunteer of the Legal Aid Clinic to becoming its Faculty Incharge.
Yes — the journey from student to teacher is beautiful.
And it's absolutely worth it.
Thank you, my dear students.
In the chaos of projects- submissions, presentations, and exams — you still find time to share your thoughts with me.
Whether through handwritten letters or heartfelt messages, you remind me why I chose this path.
These words...They are the oxygen I breathe.
Thank you, my darlings, for being there.
Happy Teacher’s Day to me.

Thursday, August 14, 2025

 आज़ादी मुबारक 



कुछ परंपराएं बहुत खूबसूरत होती हैं. इन्हीं खूबसूरत परंपराओं में से एक है स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का राष्ट्र के नाम संदेश. देश के अभिभावक का संबोधन देशवासियों के नाम. 
मैं बचपन से ये संदेश सुनती आ रही हूँ. तब से जब समझ में कुछ नहीं आता था. ये अलग बात है कि भाव विह्वलता के अतिरेक में बातें अब भी दिमाग से ज्यादा दिल तक पहुंचती हैं. लेकिन एक बात है जो हर बार खूब अच्छे से समझ आई है और वो है एक खुशनुमा एहसास. #Feelgood 
बचपन में हम रेडियो पर सुना करते थे, बाद में टीवी पर और अब YouTube पर. सुनने या देखने के साधन अब ज्यादा उपलब्ध हैं. रेडियो या टीवी के साथ एक अनुशासन होता था कि अगर छूट गया तो छूट जाएगा. अब हाथ में मोबाइल, टैब और लैपटॉप है तो सुरक्षा का भाव रहता है कि अगर छूट गया तो फिर देख सुन लेंगे, लेकिन छूटता नहीं है. अच्छी बात है कि अबतक ये अनुशासन बना हुआ है. 
सोचती हूँ इस अनुशासन के पीछे क्या भाव हो सकता है. राष्ट्रप्रेम अपनी जगह है, लेकिन शायद कृतज्ञता का भाव ज्यादा है. ज़िंदगी से कृतज्ञता इस बात की कि मैं एक आज़ाद देश में पैदा हुई, कि मेरा संविधान मुझे मूलभूत अधिकार देता है, कि मेरा कानून मुझे स्त्री होने का विशेषाधिकार प्रदान करता है, कि मुझे अभिव्यक्ति की आज़ादी है, कि मैं स्वतंत्र हूँ, कि मैं स्वच्छंद हूँ, कि मैं भारतीय हूँ.

शुक्रिया ज़िंदगी 

हर बार राष्ट्रपति के मुंह से "मेरे प्यारे देशवासियों" संबोधन सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. लगता है देश को मैं प्यारी हूँ. मुझे तो मेरा देश प्यारा है हीं.
जब राष्ट्रपति के संबोधन में देश की उपलब्धियां गिनाई जाती है तो मैं गौरवान्वित हो उठती हूँ. जब अतीत की गलतियों से सीख लेने की बात आती है तो मैं मन ही मन सजग होकर प्रण लेने लगती हूँ कि कम से कम अपनी तरफ से कोई गलती नहीं करूंगी. जब देश की समस्याओं और आतंक या आपदा पीड़ितों की बात आती है तो देश की साझा पीड़ा से मेरे आंसू लुढ़क पड़ते हैं.
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का यह संबोधन मुझे मेरे देश और देशवासियों से चमत्कारिक रूप से जोड़ता है. आम दिनों में जो शिकायतें सरकारी नीतियों या फैसलों से रहती है वो गायब सी हो जाती है. मन में बस कृतज्ञता का भाव रहता है.
शुक्रिया ज़िंदगी कि मैं स्वतंत्र हूँ, कि मैं स्वच्छंद हूँ, कि मैं भारतीय हूँ.
हम सबको आज़ादी मुबारक.

🖊️ प्राची 

Thursday, July 17, 2025

मेरी पसंद वाला रंग

 मेरी पसंद वाला रंग 


आसमान का सलेटी रंग,
और उसपर मंडराते सफेद काले बादल 
पेड़ के पत्तों का हरे से थोड़ा ज्यादा हरा रंग,
तनों और शाखाओं ने मानों लगाया काला काजल
भीगी हुई हवा का रंग
मुझे पसंद है बारिशों वाला रंग 

घने कोहरे से झांकते पेड़ों का हरा- सफेद रंग,
खुशबुओं से भरे साग सब्जियों के खेतों का रंग
कोहरे की चादर ओढ़े सरसों के फूलों का मुस्कुराता पीला रंग
बेतरतीबी से खड़े मटर और कतार में खड़े टमाटर के पौधों का रंग 
ठिठुरती हुई हवा का रंग
मुझे पसंद है जाड़ों वाला रंग

धूसर मिट्टी पर बिखरे झड़े हुए पत्तों का रंग
नई कोंपलों का रंग, 
आम के गिरे मंजर से सनी हुई मिट्टी का रंग
फगुनिया हवा के झोंको से बौराए जीवों का रंग 
गर्मी की आहटों का रंग 
मुझे पसंद है पतझड़ और बसंत वाला रंग 

सुबह का रंग, शाम का रंग
जीवन के हर भाव का रंग
उगते सूरज का रंग, ढलती शाम का रंग
दोपहर की तपिश का रंग, चांद की चांदनी का रंग
प्रकृति का हर रंग है
मेरी पसंद वाला रंग

Friday, March 28, 2025

 शहतूत


बचपन में खाए गए इस भूले बिसरे फल पर अचानक निगाह पड़ी... कुछ सेकंड्स लगे याद आने में कि ये तो शहतूत है.
ये वही है जिसे हम तूत कहा करते थे. Memory retrieval की इस धीमी प्रक्रिया में मैं तूत के ठेले से आगे निकल गई और फिर लौटकर आई. 
"भईया, ये शहतूत है न" 
फलवाले ने ऐसे घूरा मानो कह रहा हो, "ये बड़ी बड़ी आँखे किसलिए सजा रखी हैं अपने मुँह पर, जो हमसे पूछ रही हो"
अपने बेवकूफाना सवाल की शर्मिंदगी को छुपाते हुए हमने जल्दी से शहतूत खरीद कर बैग में रख लिए. 
घर वापस आकर सबसे ज्यादा हड़बड़ी खरीदी गई नई किताबों को पढ़ने की थी, लेकिन रोजमर्रा के काम चीख चीख कर अपनी तरफ बुला रहे थे, दिन भर की थकान हावी हो रही थी, चाय की तलब लगी थी और दीदी लगातार video call कर रही थी पुस्तक मेला से खरीदे गए खजाने के प्रदर्शन (आज की भाषा में Unboxing) के लिए. 
जाहिर सी बात है, दिलो दिमाग और शरीर ने आराम को चुना. बेतरतीबी से बैग एक तरफ पटक कर और चाय गटक कर मैं बिस्तर पर पसर गई. 
Video call पर नया खजाना देखा, दीदी ने लगभग हर किताब से कुछ पढ़ कर सुनाया और पता नहीं कब मैं सो गई... 
मीठी नींद से जब जागी तो रोजमर्रा के काम निपटाये और कुछ fruits खाने का सोचा... 

एकदम से याद आया, "बैग में तूत पड़े हैं" मैं बैग पर टूट पड़ी. 
ये फल इतना दुर्लभ तो है नहीं अपने देश में, पता नहीं मुझे इतने सालों से खाने को क्यों नहीं मिला... 

कुछ शहतूत खट्टे थे जिन्हे अंखियो से गोली मारते हुए खाया. इन खट्टे शाहतूतों ने बचपन की मीठी यादों में पहुँचाया. 

कौन कहता है Time- travel सिर्फ जादुई कहानियों में होता है 😊

अलविदा 2025 ईश्वर की कृपा से एक और साल सही सलामत गुजर गया. कुछ सीख, कुछ खुशियां और नई आशाएं देकर गया ये साल 2025. दिसंबर के कोहरे भरे दिन और...