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Monday, May 11, 2026

 जादू नगरी की ओर 


आज पृथ्वी लोक की सुंदरी से मिलने जादू नगरी की चिड़िया आई. धवल सफेद चिड़िया का सिर हरा और पंख गुलाबी थे.  झक सफेद मुँह पर काले काले नैन और काली चोंच. अनोखी थी ये चिड़िया - स्वतंत्र, स्वच्छंद, प्रसन्नचित. 

पृथ्वी लोक की सुंदरी तो अपने रोजमर्रा के कामों में उलझी हुई थी. बिखरे कामों को समेटते समेटते सुंदरी ने अपने घने घुंघराले बालों को भी जूड़े में बांध रखा था. कामों की उलझन में पृथ्वी लोक की सुंदरी को जादू नगरी की चिड़िया के आने का आभास न हुआ. 

जादू नगरी की अनोखी चिड़िया पृथ्वी लोक की सुंदरी के जूड़े पर बैठ गई मानो बंधे जूड़े को खोलने का कह रही हो, मानो स्वच्छंदता का संदेश दे रही हो, मानो बंधनों को तोड़ने का कह रही हो. चिड़िया ने उसके कांधे के तिल की सराहना की. उसके घुंघराले बालों को अपने मखमली पंखों से सहलाया. उसके नीले दुपट्टे को अपनी चोंच से खींचा. उसके कानों में मधुर गीत गुनगुनाए. उसे जादुई दुनिया के बारे में बताया. वहां पहुंचने का रास्ता भी बताया. 

जादू नगरी की चिड़िया की चाहत थी कि पृथ्वी लोक की सुंदरी भी स्वतंत्र, स्वच्छंद, प्रसन्नचित होकर जादू नगरी की सैर पर निकल पड़े. 

मगर पृथ्वी लोक की सुंदरी ठहरी एक मनुष्य. सैकड़ों बंधनों में बंधी, रोजमर्रा के कामों में उलझी एक साधारण मनुष्य. वो न सुन पाई जादू नगरी की चिड़िया का जादुई संदेश. वो न समझ पाई उसकी स्वच्छंदता का मतलब. वो न खोल पाई अपना बंधा  जूड़ा. 

आज जादू नगरी की चिड़िया को अपने देश वापस लौटना पड़ा.

मगर, ये चिड़िया फिर आएगी. वो आती रहेगी. वो पृथ्वी लोक की सुंदरी को जादुई नगरी का रास्ता बताती रहेगी.

एक दिन ऐसा आएगा जब पृथ्वी लोक की सुंदरी को जादू नगरी की चिड़िया की बात समझ आ जाएगी.

उस दिन सुंदरी अपना बंधा जूड़ा खोल देगी. उस दिन वो स्वच्छंद हो जाएगी. वो भी उड़ना सीख लेगी. 

उस दिन जादू नगरी की चिड़िया अपना गुलाबी पंख फैला कर उड़ पड़ेगी और पृथ्वी लोक की सुंदरी भी अपना नीला दुपट्टा लहरा कर उड़ पड़ेगी जादू नगरी की ओर...


🖊️ प्राची 

Friday, March 20, 2026

एक कदम ज़िंदगी की ओर

                                       (A Short Film)


Scene 1 (छुटकी का घर)

(छुटकी के घर का दृश्य. छुटकी की माँ और बुआ जल्दी जल्दी पैकिंग कर रहीं हैं. छुटकी बीच बीच में मोबाइल देख रही है)

Voiceover- ये है छुटकी और उसका परिवार. माँ और बुआ की लाडली छुटकी आज अपने छोटे से शहर की दहलीज लांघ कर पढ़ाई के लिए महानगर जाने वाली है. ये भागमभाग इसीलिये तो मची है. माँ कपड़ों के साथ साथ नसीहतों की पोटली बांधती जा रही हैं और बुआ अचार, मुरब्बा, मिठाई, फल और जाने क्या क्या बाँधे जा रही है. छुटकी के सपनों के आगे माँ और बुआ ने अपने आँसुओ को दबा रखा है.

छुटकी - अरे माँ, बुआ; अब बस भी करिये आपलोग. Train का time हो गया है.

(तभी बाहर से Scooter की beep सुनाई देती है)

छुटकी - लो, पापा ने scooter start भी कर दिया है. मैं निकलती हूँ.

(माँ और बुआ छुटकी को दही चीनी खिलाती हैं)

माँ - खूब फूलो फलो बिटिया.

बुआ - पढ़ लिखकर अफसर बनो मेरी लाडो रानी.

(छुटकी जाती है.)

Scene 2 ( Scooter का पहिया और फिर train की window का Scene, then Chutki at her college’s gate)

Voiceover- और इसतरह चल पड़ी छुटकी अपने सपनों के महानगर की तरफ और पहुंच गई अपने महाविद्यालय. छुटकी को खुशी इस बात की है कि अब मम्मी और बुआ की रोक टोक खत्म. Decisions खुद ले सकती है छुटकी. आइये देखते हैं कैसे decisions लेती है छुटकी. 

Scene 3 (छुटकी का college, छुटकी इधर उधर देखते हुए आती है. तभी वहाँ एक और लड़की निवेदिता आती है)

निवेदिता - Hi, I am Nivedita, a first year student.

छुटकी - Hello, मैं हूँ छुटकी, I mean Shreya.

निवेदिता - छुटकी हाँ (चिढ़ाते हुए हँसती है) अब तो बड़ी हो जाओ छुटकी.

छुटकी - श्रेया बुलाओ मुझे. चलो class ढूंढ़ते हैं.

(तभी इनकी नज़र एक तरफ खड़ी 3 लड़कियों पर पड़ती है. छुटकी बड़े हसरत से उन लड़कियों के cool looks को देखती है और फिर अपने साधारण getup को देखती है. निवेदिता उसके भाव पढ़ लेती है.)

निवेदिता - क्यों, बनना है उनके जैसा cool? Seniors हैं. मैं जानती हूँ उनको. I can introduce you. 

छुटकी - नहीं यार. Class चलते हैं न. बुआ ने कहा है पढ़ लिखकर अफसर बनना. 

निवेदिता - (मजाक उड़ाते हुए हँसती है). तुम छुटकी की छुटकी हीं रहोगी. 

छुटकी - (कुछ पल खड़े होकर सोचती है) चलो, मिलवाओ मुझे. 

Voiceover - तो पहला decision जो छुटकी ने खुद के लिए लिया वो ये है कि उसे COOL बनना है. अब COOL बनने के लिए पहले class छूटी और कैंटीन को ठिकाना बनाया, और फ़िर…

Scene 4 - Time lapse Scene (Introduction in College lawn and friendship in Canteen then… )

(छुटकी और निवेदिता उन cool girls के पास जाती हैं. सब आपस में मिलते हैं. कैंटीन में तीनों Cool Girls and Nivedita आँखो आँखों में कुछ इशारा करती हैं.  एक Senior अपनी pocket से कुछ drugs निकालती है और दूसरी सीनियर nod करती है. Screen पर कुछ drugs दिखते हैं.)

The following information appears on screen over drugs’ footage. 

Classification of Drugs under the NDPS Act, 1985

Narcotics- Opium, Morphine, Heroine

Depressants- Barbiturates, Tranquilizers

Stimulants- Amphetamine, Cocaine

Hallucinogens- LSD, Charas, Ganja, Mescaline

Note- Ganja and Charas are frequently abused drugs and are available in almost all parts of the country

Scene 5- उसके बाद पेड़ के पीछे ले जाकर धीरे धीरे छुटकी को drugs से introduce कराया जाता है. छुटकी drugs लेने से मना करती है.) 

तीनों seniors और निवेदिता - तुम छुटकी की छुटकी हीं रहोगी. ( सब हँसते हैं )

छुटकी - छुटकी मत बुलाओ मुझे. मैं श्रेया हूँ. लाओ. ( Seniors से drugs लेकर consume कर लेती है. Screen freezes over drugs consuming girls and then Blank Screen.)

The following information appears on screen over girls consuming drugs footage.

The National Survey on the Extent and Pattern of Substance Use in India, 2019 

(conducted by the Ministry of Social Justice and Empowerment) 

  • Approximately 3.1 crore individuals (2.8%) have used cannabis in the year 2018 
  • 72 lakh (0.66%) have experienced cannabis related disorders
  • Use of cannabis products was observed to be 2% (approx. 2.2 стоге persons) for bhang
  • About 1.2% (approx. 1.3 crore persons) for ganja and charas
  • Opioid consumption stands at 2.06%
  • About 1.18 crore (1.08%) individuals engage in the non-medical use of sedatives

Additionally, an estimated 8.5 lakh people are classified as People Who Inject Drugs (PWID)

Voiceover - ओह, तो छुटकी ने जो cool बनने का decision लिया था उसका अंजाम ये निकला. इसको drugs consume करना पड़ा. 

Scene 6- (निवेदिता छुटकी को जगा रही है. Seniors वहाँ से जा चुकीं हैं. तभी वहाँ Legal Aid Clinic की एक Volunteer आती है.)

Volunteer, Legal Aid Clinic - क्या हुआ ? तुम दोनों यहाँ ऐसे क्या कर रही हो ?

निवेदिता - (जल्दी से) नहीं Ma'am, कुछ नहीं हुआ है.

Volunteer, Legal Aid Clinic - मैं Legal Aid Clinic की volunteer हूँ. I can help you. 

(निवेदिता छुटकी को रोकने की कोशिश करती है, लेकिन छुटकी Eka को सब बता देती है… Mute Scene…)

SCENE 7 (LEGAL AID CLINIC) 

(निवेदिता और छुटकी  Volunteer, Legal Aid Clinic के सामने बैठे हैं.)

Volunteer, Legal Aid Clinic - देखो, National Legal Services Authority ने साल 2025 में एक Scheme जारी की है जिसको NALSA (Drug Awareness and Wellness Navigation for a Drug Free India) Scheme कहते हैं. इसी Scheme के तहत District level पर Drug Awareness and Wellness Navigation (DAWN) Units establish किए जाते हैं. इस unit का inter-agency collaboration होता है educational institutions and healthcare sector के साथ. हम उनके साथ मिलकर legal aid भी provide करते हैं और rehabilitation भी.

डरो मत. Let me make a Phone call.

(Telephonic conversation. Initially mute, then DAWN UNIT OFFICER'S voice over phone)

DAWN UNIT OFFICER'S voice over phone - ठीक है. इस तरह के बहुत से केसेस हमारे पास आते हैं. हमारा collaboration healthcare centre से है. मैं आपको वहाँ रेफर कर रही हूँ.

SCENE 7 (Health Care Centre)

(निवेदिता और छुटकी Doctor के सामने बैठे हैं.)

Doctor- घबराने की कोई बात नहीं है. तुम्हारे addiction को छुड़ाया जा सकता है. ( Mute scene)

SCENE 8 (Yoga Centre)(निवेदिता और छुटकी Yoga centre में  yoga and exercise कर रही हैं. Doctor सामने खड़ी हैं)

SCENE 9 (निवेदिता और छुटकी एक दूसरे का हाथ पकड़े मुस्कुराते हुए फूलों के पीछे से जा रहीं हैं. कैमरा निवेदिता और छुटकी से होता हुआ फूलों पर फोकस करता है.)

The following information appears on screen over flowers’ footage.

#SayYestoLifeNOtoDrugs

#DrugsFreeIndia

#NashaMuktBharat

#YuddhNashekeVirudh

#NopetoDope

SCENE 10- The screen goes blank. The following information appears on screen over Blank screen.

SAY YES TO LIFE, NO TO DRUGS

http://pledge.mygov.in/fightagainstdrugabuse/ 

MANAS- National Narcotics Helpline Number- 1933

Portal www.ncbmanas.gov.in 

Rehabilitation and Counseling Helpline Number- 14446

NALSA’s Helpline Number- 15100

Voiceover for Scenes 8, 9 and 10 - चलिए, हमारी छुटकी पहला decision लेने में भले हीं गड़बड़ा गई हो पर Legal Aid Clinic के volunteer को सारी बातें सच सच बताकर छुटकी ने समझदारी दिखाई. छुटकी और उसकी दोस्त दोनों को Drug Awareness and Wellness Navigation Unit की help से बचा लिया गया. इन युवाओं ने बढ़ाए अपने कदम ज़िंदगी की ओर.

आप भी समझदार बनिये. Say yes to life, No to drugs.

MANAS Helpline number 1933 पर संपर्क करें. Rehabilitation और Counseling के लिए  Helpline Number- 14446 पर संपर्क करें. 



CREDITS:- 

Characters (in order of appearance)

Chutki/ Shreya- Shreya Tiwari

Maa- Shivangi Neemvanshi

Bua- khushi Tiwari

Nivedita- Nivedita 

Senior 1- Srishti Singh

Senior 2- Sumedha Singh

Senior 3- Saloni Singh 

Volunteer (Legal Aid Clinic)- Eka Ishwari

Doctor- Divyanshi Mishra


Voiceover- Kumkum Tiwari

Music- Shokhi Sharma

Cameraperson- Krishan Tiwari

Editor- Swapnil Chauhan


Logistics Head- Dr. Riya Mukherjee 

Story & Concept- Ms. Riya Sinha 

Writing & Direction- Ms. Prachi Kumari 


Presented by:-

Saroj Lalji Mehrotra Centre of Legal Studies,

S. S. KHANNA GIRLS' DEGREE COLLEGE, PRAYAGRAJ 

UTTAR PRADESH 


Theme:- 

NALSA DAWN (Drug Awareness and Wellness Navigation for a Drug Free India) Scheme, 2025


🖊️ प्राची 

Monday, March 16, 2026

नई शिक्षा नीति, 2050 

पात्र परिचय:- 
  1. Two News Anchors
  2. UGC Chairperson 
  3. Secretary, Ministry of Human Resources 
  4. Two Professors of Old Conventional Subjects 
  5. Three Professors of New Unconventional Subjects
  6. AI faculty
  7. Aspirant Father (बच्चों को सरकारी नौकरी दिलाने, especially UPSC clear कराने का सपना देखने वाला पिता) 
  8. यमराज 
  9. चित्रगुप्त 
  10. YouTube देखकर Surgery करने वाला फर्ज़ी Doctor
  11. Police Inspector
  12. Librarian 

Scene

{News Anchors, UGC Chairperson, Secretary (HRD), Professors of Old- Conventional Subjects, Professors of New Unconventional Subjects, AI Faculty and Aspirant Father are sitting in the News Room}

News Anchor 1:- नमस्कार. 'चर्चा धमाकेदार' कार्यक्रम में आपका स्वागत है. आज है 1st April, 2050. शुरूआत करते हैं आज की सबसे धमाकेदार खबर से. भारत सरकार ने एक बार फिर से नई शिक्षा नीति प्रस्तावित की है. बहुत ही क्रांतिकारी बल्कि यूँ कहें कि UNCONVENTIONAL कदम उठाए जा रहें हैं इस नई नीति के द्वारा और पुराने Conventional Subjects को हटा कर बिल्कुल नए subjects introduce किये जा रहें हैं. कहा ये जा रहा है कि NEW EDUCATION POLICY, 2020 को आये 30 साल बीत चुके हैं. जिस उद्देश्य से 2020 में इस नीति को लागू किया गया था, आज साल 2050 का समाज उस से काफी आगे निकल चुका है. 

News Anchor 2 - खबर पर विस्तार से चर्चा करने के लिए आज हमारे Newsroom में मौजूद हैं UGC Chairperson, पुराने Conventional Subjects के teachers और साथ ही साथ नए Unconventional Subjects के teachers. 

स्वागत है आप सबका हमारे Channel पर.

सभी एक साथ - Thank you

News Anchor 1 - सबसे पहले बात करते हैं UGC Chairperson से. कहा ये जा रहा है कि traditionally जितने भी subjects अबतक universities में पढ़ाए जा रहे थे, अब उनका कोई relevance नहीं बचा है और इसीलिए अब new subjects introduce किये जा रहे हैं. आपका क्या कहना है? 

UGC CHAIRPERSON - देखिये, जब New Education Policy, 2020 लागू की गई थी, वही वो साल था जब लॉकडाउन लगा था और India में YouTube as career बहुत boom हुआ था. तब से अबतक हमारे देश में लाखों Youtuber बने. अब situation ये है कि country के youth Youtuber या influencer बनना चाहते हैं. इसीलिए हम Humanities Stream की जगह पर YouTube stream introduce कर रहें हैं. 

News Anchor 2 - Seriously ! YouTube as stream !

New Professor 1 - Ofcourse yes. Traditional education system से employment नहीं मिलती, जबकि YouTube से करोड़ो की income possible है, then why not 

Old Subject's Professor 1 - what an irony. Do you even realize this approach is causing death of traditional subjects, death of the beautiful stream of humanities... 

Secretary (HRD) - देखिये, ऐसा है. उन subjects में कोई admission नहीं ले रहा. हमारे पास आंकडा है. देशभर में लाखों seats खाली जा रहीं हैं. देश का youth YouTube पर हीं career बना रहा. खाली seats से देश की economy का नुकसान करने से बेहतर है new subjects को मान्यता दे दी जाए. Redundant subjects को हटा रहे हैं. अब आप चाहे उसको death cause करना कह लें.

(तभी वहाँ यमराज और चित्रगुप्त आते हैं) 

यमराज - Death... कौन यहाँ निरंतर मृत्यु को पुकार रहा है? 

News Anchor 1 - Who are you? How could you enter our newsroom? SECURITY...

News Anchor 2 - छोड़ ना, TRP बढ़ेगी. Interesting getup में हैं दोनों.

News Anchor 1 - ये भी ठीक है.

यमराज - हम हैं मृत्य के देवता यमराज. हमारे साथ हैं चित्रगुप्त जी. हम यहाँ उन पुराने विषयों के प्राण हरने आये हैं, जिनकी मृत्यु कारित हुई है.

Aspirant Father - नहीं यमराज जी नहीं. उन पुराने विषयों की बहुत जरूरत है समाज को. अरे भई, UPSC में आज भी वही विषय पूछे जाते हैं. हम अपने बच्चों को अफसर बनाना चाहते हैं.

New Professor 2 - पर आपके बच्चे YouTuber बनना चाहते हैं. जानती हूँ मैं उनको. मेरे हर video पर comment करते हैं. हर Meet n Greet में मिलने आते हैं. YouTube stream पढ़ना चाहते हैं आपके बच्चे. 

News Anchor 2 - यहाँ पर मैं बीच में टोकना चाहूँगी. क्या ये सच है कि ये सारे New teachers ना तो Ph.D. degree holder हैं, और ना हीं UGC NET qualified हैं. इनका appointment सिर्फ इसलिए हुआ है कि ये सब established youtubers हैं? 

UGC CHAIRPERSON - Need of the hour madam. What else could we do? By the way, सिर्फ Youtubers नहीं, अब तो AI का जमाना है. मिलिए हमारी AI faculty से. 

AI Faculty - नमस्ते. बताइये, आप किस भाषा में बात करना पसंद करेंगे? मुझे संसार की समस्त भाषाएँ आतीं हैं. मुझे संसार के समस्त विषय आते हैं. I know everything. अहं ब्रह्मास्मि. 

Secretary (HRD) - ये Govt. का Masterstrok है. AI faculty को salary की भी जरूरत नहीं,  work- hour का load नहीं. बस एक बार खरीदा और जीवन भर की मुश्किल आसान. सरकार धीरे धीरे करके देश की सभी universities में AI faculties appoint कर लेगी. 

New Professor 3 - As if we care. हमारे YouTube से बहुत income है. We don't need this job.

Secretary (HRD) - सिर्फ यही नहीं, Hospitals में Doctors भी AI Robots होंगे. हम Medical stream भी समाप्त करने की घोषणा जल्द करेंगे. सबसे जरूरी, Engineering की पढ़ाई तो बंद हीं कर देंगे. सारे के सारे Engineers YouTubers बने पड़े हैं. 

चित्रगुप्त - वो सब देख लेना बाद में. पहले हमको अपना काम करने दो. यमराज जी, आप पुराने विषयों के साथ साथ पुराने शिक्षकों का भी प्राण हरण करते चलिए. 

यमराज- अति उत्तम सुझाव चित्रगुप्त जी. अब इन पुरा विषयों के शिक्षकों का पृथ्वी लोक में क्या काम... मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति... इनकी सार्थकता नहीं है अब पृथ्वी पर. 

Old Subject's Professor 2 - ऐसे कैसे सार्थकता नहीं है पृथ्वी पर हमारी. हमको अब Humanities पढ़ाने को नहीं मिलेगा तो क्या, हम भी YouTube channel खोल लेंगे. उस पर साड़ी पहनाना सिखाएंगे, Daily Vlog बना लेंगे. 'Hey guys, देखो ना, देखो ना' कर लेंगे. क्यों बहन. 

Old Professor 1 - तो मतलब अब, 'Hey guys, चाय पी लो' करना पड़ेगा. (अफसोस से सिर हिलाती हैं

यमराज- ईस्वी सन् 2050 है. हम भी YouTuber बन जाएं क्या? 

चित्रगुप्त - (चुपके से कोहनी मारते हैं) क्या बक रहे हैं ? 

यमराज - (जीभ दबाते हैं) हाँ, हम बस पुराने विषयों का प्राण हरण करके प्रस्थान करते हैं.

(तभी वहाँ Police Inspector फर्ज़ी डॉक्टर को गिरफ्तार करके ले आते हैं) 

Inspector - यमराज जी, आप इस डॉक्टर के प्राण ले जाइये. (News Anchor की तरफ देखकर) लो जी मैडम, ये रहा आपका breaking news.

चित्रगुप्त - But as per my data, अभी इसकी death का time नहीं हुआ है.

Inspector - और ये जो दूसरों की death cause कर रहा है उसका क्या ?

यमराज - पुत्र, प्राण हरण करना तो हमारा काम है. तुमने कैसे किया ये ?

फर्जी Doctor - मैंने Youtube देखकर surgery करना सीखा और कर दिया. अब वो मर गया तो मेरी क्या गलती. मैंने वही steps follow किए जो Youtuber ने बताये थे. मम्मी भी तो Youtube देखकर खाना पकाती है. कोई नहीं मरता उस खाने से. 

(तभी वहाँ Librarian आती हैं)

Librarian - मरना तो हमको चाहिए. हम ठहरे Librarian, पर अब किताबों की physical copy कोई पड़ता हीं नहीं. सबकुछ Digital Library से पढ़ रहें हैं आजकल के बच्चे. और तो और, Youtube देख कर पढ़ते हैं ये लोग. यमराज जी, आप हमको अपने साथ ले चलिये.

New Professor 2 - देखिए, Youtube को blame करना बंद कीजिए. मैंने तो गाना गाना भी Youtube से सीखा है. मेरे channel का नाम 'सुरीली कोयल' ऐसे हीं नहीं है. सुनिये मेरा आलाप (बेसुरा गाना गाती है)

New Professor 3 - मैंने Rampwalk and Fashion, दोनों Youtube से सीखा है. आज मैं Fashion- Influencer हूँ, called "The Walking Cat". See my walk. (Rampwalk करके दिखाती है)

New Professor 1 - And My Channel is called 'Ding- Dong Dancer'. मेरे Followers मेरे moves के दीवाने हैं. (Dance करती है)

यमराज - तो राज की बात ये है कि हम भी कोई यमराज नहीं हैं और ये कोई चित्रगुप्त नहीं हैं. हमारा YouTube channel है, 'कूकरू कू मुर्गा'. अभी आप सबका मुर्गा बन रहा था. वो देखिए, कैमरे लगे हुए हैं. 

सुनो मैडम, हमारे साथ Collab- video बनाओ न. 

News Anchor 1 - How dare you ? Our channel will sue you.

चित्रगुप्त - Sue us, means Controversy, means more views. Bring it on.

(News Anchors गुस्से से देखती हैं. यमराज और चित्रगुप्त वहां से गुनगुनाते हुए जाते हैं)

यमराज और चित्रगुप्त - Youtube का जमाना है. Youtube का जमाना है. 

All Professors - New Education Policy, 2050 

                            #Youtube Policy


🖊️ प्राची 

Wednesday, January 28, 2026

एक थी मानव सभ्यता 



पात्र परिचय
  1. अरावली पर्वत ( a girl dressed up like Arawali Hills, mostly green towards head depicting biodiversity and earthy brownish towards legs depicting mining)
  2. हिमालय पर्वत (a girl dressed up like Himalaya, mostly white towards head depicting snow and dark brownish towards legs depicting mountain)
  3. खनन माफिया - 3 लोग 
  4. केंद्रीय मंत्री
  5. केंद्रीय मंत्री के सेक्रेटरी 
  6. पर्यावरणविद 
  7. प्रोफेसर 
  8. छात्र नेता
  9. लोकल लीडर/ (स्थानीय नेता)
  10. 4 छात्र 

Scene 
(अरावली और हिमालय अपनी- अपनी  जगह पर चुपचाप खड़े हैं. तीनों खनन माफिया अरावली की खुदाई कर रहे हैं. पर्यावरणविद, प्रोफेसर, छात्र नेता, स्थानीय नेता, 4 छात्र “खनन माफिया हाय हाय” कहते हुए मंच पर आते हैं। उनके हाथ में "अरावली बचाओ" और #SaveEnvironment के पोस्टर हैं.) 

लोकल लीडर – हम यहाँ धरने पर बैठेंगे। जब तक केंद्रीय  मंत्री आकर हमें जवाब नहीं देते, हम यहाँ से नहीं हिलेंगे। मैं तो स्थानीय नेता हूँ. पर अब हमारी इस लड़ाई में प्रोफेसर साहब, देश के जाने माने पर्यावरणविद, छात्र नेता एवं छात्र सहयोगी हमारे साथ हैं. 
छात्र नेता- ya ya, we will follow democratic method. Our generation is very like enthu about protecting environment.
सबलोग एक साथ - “खनन माफिया हाय हाय”
(प्रोफेसर सबको शांत रहने का इशारा करते हैं)
प्रोफेसर - हमारी लड़ाई किसी खास खनन माफिया से नहीं है बल्कि हमारा उद्देश्य पर्यावरण को सुरक्षित करना है.
पर्यावरणविद - हां, हमारा पूरा ecosystem तबाह हो जाएगा अगर हम अरावली को नहीं बचा पाएंगे. 

(तभी अरावली भी बोल पड़ती है.)

अरावली – “क्या बच्चों, बचा पाओगे मुझे? बल्कि ये कहना चाहिए कि क्या बचा पाओगे खुद को?”

Student 1- OMG, The Aravali herself is speaking.
Student 2- Unbelievable, let's take a selfie. 
Student 3- yesssss, let's make a story. 

(सभी छात्र अरावली के साथ फोटो खींचने लगते है)

Student 4- we will go viral #Save environment

(पर्यावरणविद, प्रोफेसर और स्थानीय नेता छात्रों को देखकर अफसोस से सिर हिलाते हैं. प्रोफेसर छात्रों को खींचकर पीछे ले जाते हैं.)

पर्यावरणविद - प्रकृति जब स्वयं मनुष्य से बात करने लगे तो समझ जाना चाहिए कि प्रलय का दिन आनेवाला है. अरावली, हम आपको बचाने का प्रयत्न कर रहे हैं.

(तभी वहां केंद्रीय मंत्री आते हुए दिखते हैं .)

सबलोग एक साथ- मंत्रीजी आ गए, देखो देखो, मंत्रीजी आ गए. उनकी सेक्रेटरी भी साथ आईं हैं.
लोकल लीडर - मंत्रीजी, जिंदाबाद. मंत्रीजी जिंदाबाद 

(मंत्रीजी अरावली को दंडवत प्रणाम करते हैं)
केंद्रीय मंत्री - माता अरावली, आपका ये प्रकृति प्रेमी पुत्र आपकी सुरक्षा अवश्य करेगा. हमारी सरकार पर्यावरण की सुरक्षा को सदैव तत्पर है. हम पूर्ण प्रबंध कर रहे हैं कि...

(अरावली मंत्री की बात बीच में ही काट देती है.)

अरावली (गुस्से से) - पूर्ण प्रबंध! हुह! मेरे अंग-प्रत्यंग को काट-काटकर नष्ट कर चुके हो तुम, और अब पूर्ण प्रबंध करोगे. 
केंद्रीय मंत्री- देखिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ...

(अरावली फिर से मंत्री की बात बीच में ही काट देती है.)

अरावली (गुस्से से)- अरे तुम्हारी सर्वोच्च न्यायालय मुझे नाटी बोल रही है. मैं क्या complain पीऊंगी? 100 मीटर से कम हाइट हुई तो काट दोगे ?
पर्यावरणविद- हां, और संसार में किसी भी पर्वत चोटी की ऊंचाई मापने का जो standard तरीका है वो ये है कि पर्वत चोटी की ऊंचाई समुद्र तल से मापी जाती है ना कि सतह से. अरावली की सतह already समुद्र तल से 250 मीटर ऊपर है. इस हिसाब से अरावली की कोई पहाड़ी 100 मीटर से कम नहीं हुई. 
Student 1- Yes, मैंने पढ़ा है. Mount Everest की height 8,848 meters है from sea level, not from earth surface.
अरावली (गुस्से से) - लो कर लो बात, तुम्हारी सर्वोच्च न्यायालय ठीक से भूगोल भी न पढ़ पाई.
छात्र नेता:- I am little confused now. Problem क्या है? The Supreme Court in its judgment itself says, " the Aravali Hills and Ranges harbour rich biodiversity, with twenty-two wildlife sanctuaries, four tiger reserves, the Keoladeo National Park, along with wetlands like Sultanpur, Sambhar, Siliserh, and Asola Bhati, and aquifers that recharge river systems including the ones at Chambal, Sabarmati, Luni, Mahi, and Banas, it is more than appropriate that before permitting further sustainable mining activities, the same are preceded by preparation of an MPSM."

अरावली – ये जो अंग्रेजी के अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया है तुमने किया है ना बेटा, बहुत अच्छा… वाह शैम्पी वाह!
“Sustainable mining”… हुह 
अपने नेताजी का मोटा पेट काट दो... Sustainable figure maintenance... Huhh
अरे मैं अरावली हूँ. संस्कृत के दो शब्दों—'अरा' यानि पहाड़ की धार और 'वली' यानि रेखा/पंक्ति से मिलकर बना है मेरा नाम. सीधा मतलब - पर्वत श्रृंखला. मैं भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला हूं जो गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हूँ. तुम्हारा राष्ट्रपति भवन भी मेरे ऊपर ही बना है. मेरे बिना गुजारा नहीं है तुम्हारा.

(तभी  हिमालय भी बोल पड़ता है)
हिमालय:- अरावली दीदी सही कह रही है. इन्हीं की वजह से तुम सब थार रेगिस्तान की बालू भरी हवाओं से बचे हुए हो. अगर अरावली दीदी नहीं रहेगी तो मुझ तक इतनी गर्मी पहुंचेगी कि मेरी सारी बर्फ पिघल जाएगी. कोई नहीं बचेगा. 

(सारे students मुंह फाड़ कर हिमालय को देख रहे थे)
Student 1- Bro, पहले अरावली, Now हिमालय is speaking. I think we have done great job for environment.
Student 2- yessss bro, that's the reason every mountain is talking to us.
Student 3- Bro, I have a feeling. We might get some award for saving environment.
Student 4- yaar, सच्ची बताओ, हमलोग तो lecture bunk करने के लिए protest attend करने आ गए थे. अब award ही मिल जाएगा.

प्रोफेसर- चुप, एकदम चुप, पीछे हटो. इस generation के लिए तो environment को protect करना बेकार ही है.

(तभी वहां खनन माफिया और उनके लोग आ जाते हैं.)

लोकल लीडर- खनन माफिया हाय हाय. हम अरावली की खुदाई नहीं होने देंगे. संपूर्ण अरावली क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अनुसार कंजर्वेशन रिजर्व या कंजर्वेशन कॉरिडोर  या पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिए.

खनन माफिया 1- हमारे पास Sustainable Mining का लाइसेंस है, तो हम तो काटेंगे.
खनन माफिया 2- और नहीं तो क्या ? तुमलोग रटते रहो पर्यावरण पर्यावरण, हम तो अपनी जेब भरेंगे. 
खनन माफिया 1- सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया न uniform definition... 100 मीटर से कम ऊँचाई के जो जो पहाड़ हैं, अब काटे जाएंगे. (जेब से इंची टेप निकाल कर अरावली को मापता है.) देखो, 99 मीटर है ऊंचाई इस पहाड़ की. हम तो काटेंगे इसको. 
खनन माफिया 2- दिल्ली से permission लेके आ गए हमलोग, क्यों नेताजी. यहाँ बैठे धरना कर रहें हैं ई ससुर. 
अरावली- (गुस्से से चिल्लाती है) - बेटा, तुमलोग जो मुझे नाटा बोलकर काटने चले हो, अपने बॉलीवुड में सिर्फ़ अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण को ही रखोगे क्या? बाक़ी सबको काट दोगे क्या?
बड़े आए! हमारा कुत्ता कुत्ता, तुम्हारा कुत्ता टॉमी. हमारा पहाड़ - नाटा. तुम्हारा घोटाला - नीति.

(वे लोग हथौड़ा से अरावली को लगातार ठोकते रहते हैं. कोई नहीं रुकता. अरावली दर्द से कराहती है और धीरे धीरे गिरने लगती है)
 प्रोफेसर:- ये गलत हो रहा. Uniform definition के नाम पर ये जो 100 मीटर से कम ऊँचाई के पहाड़ काटे जा रहे हैं, गलत है.
पर्यावरणविद:- सेक्रेटरी साहिबा, जरा इस रिपोर्ट को आप ही पढ़ कर बताइए. पढ़िए, पढ़िए. 
सेक्रेटरी (हिचकते हुए)- राजस्थान में अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई
1,07,494 पहाड़ियां- 20 मीटर तक
12,081 पहाड़ियां - 20 मीटर से ऊपर
5,009 पहाड़ियां- 40 मीटर से ऊपर
2,656 पहाड़ियां- 60 मीटर से ऊपर
1,594 पहाड़ियां- 80 मीटर से ऊपर 
सिर्फ 1,048 पहाड़ियां- 100 मीटर से ऊपर

पर्यावरणविद- ये सिर्फ राजस्थान का data है. बाकी तीन राज्यों का data भी ऐसे ही alarming है. 
हिमालय – कोई भी आंकड़ा जितना खतरा बता रहा है, उस से ज्यादा खतरनाक है अरावली पर्वतमाला का कटना. अरावली दीदी के हटते ही मैं भी पिघल जाऊँगा. 
तो अब एक तरफ़ से झेलो थार रेगिस्तान की रेत और दूसरी तरफ़ से हिमालय के पिघले ग्लेशियर का प्रवाह.

सब लोग – बचाओ बचाओ, बहुत रेत है, कुछ दिख नहीं रहा.
मुँह में बालू आ रही है, साँस नहीं आ रही.

सब लोग – अरे, इधर देखो, बहुत तेज़ी से पानी बह कर आ रहा है, हम डूब रहे हैं.
त्राहिमाम! त्राहिमाम!

Student 2- Let's take one final selfie.

हिमालय- अलविदा मानव सभ्यता.
अरावली – ये तुच्छ मनुष्य स्क्रिप्ट लिखने चले थे – “एक थी अरावली”
इनका बन गया – “एक थी मानव सभ्यता”

🖊️ प्राची 

Friday, January 16, 2026

 “नूह का कबूतर”: एक सुंदर किताब 


साल 2026 की एक सुंदर शुरुआत हुई. “नूह का कबूतर” पढ़ने की चाह थी. दोस्त को अपनी चाहत बताई थी कि खरीदनी है. आज सत्र के पहले दिन ये सारी चीजें उपहार स्वरूप प्राप्त हुई. खिली हुई बांछे और जल्दी जल्दी सारी चिट्ठियों को पढ़ने की बेचैनी एकसाथ मेरे चेहरे पर नजर आई. घर आकर सबसे पहले दीदी को फोन किया और बाबुषा कोहली की पाती पढ़कर सुनाया. फिर ईदगाह के हामिद को लिखा पैगाम पढ़ा. अब पढ़ने की जल्दी से ज्यादा स्थिरता का अनुभव हो रहा. ये जल्दी जल्दी पढ़कर खत्म कर देने वाली किताब नहीं है बल्कि स्थिर मन से बैठकर आहिस्ता आहिस्ता ग्रहण करने लायक ग्रंथ है. एक एक किरदार के जीवन के उतार चढ़ाव को शब्दों के माध्यम से सब्र के साथ देखने की कवायद है ये किताब.

हम चिट्ठियों के जमाने के ही तो हैं. लैंडलाइन फोन पर तफसील से बात नहीं हो पाती थी. मोबाइल का पदार्पण जीवन में बहुत बाद में हुआ. अपना बचपन चिट्ठी पाती के भावात्मक संदेशों से घिरा हुआ था. कभी फूआ की चिट्ठी कभी मौसी की पाती. कभी खुशखबरी लाते, कभी जीवन की परेशानियाँ बयान करते खत. उनका जवाबी पैगाम लिखने की कवायद. लिफाफे, अन्तर्देशीय इत्यादि पर लिखे गए संदेश. कम शब्दों में ज्यादा बयां करने की कला सिखाते पत्र.

पत्रिकाओं में पढ़कर पेन फ्रेंड का कांसेप्ट सीखा था. मेरा कोई पेन फ्रेंड कभी नहीं रहा पर उन दिनों बहुत मन होता था कि काश हामिद का पता मिल जाता तो उस से पत्र व्यवहार होता. हलकू से बात करने की इच्छा होती थी और उसके जबरा से भी. इच्छा होती थी उन नीलगायों को अनुनय विनय भरा संदेश भेजने की कि हलकू का खेत ना खाओ. असंख्य किरदार जो बचपन में टकराए थे और जिनसे पत्र व्यवहार करने की इच्छा थी और जो इच्छा अबतक पूरी ना हो पाई थी क्योंकि उन किरदारों का पता नहीं था मेरे पास.

“नूह का कबूतर” ने ये सिखाया कि पत्र तो बिना पते के भी लिखे जा सकते हैं. अपना संदेश अपने प्रिय किरदार तक पहुंचाने की चाह हो तो पते का लापता होना आड़े नहीं आता.

“नूह का कबूतर” = मधुर पातियों को सहेजे एक सुंदर किताब. 

शुक्रिया विकास रावल जी मुझ तक यह उपहार भेजवाने के लिए.

शुक्रिया प्रगति राज जी मुझ तक यह उपहार बोनस के साथ यानि मेरा नाम खुदे कलम के साथ लाने के लिए.  

हिंदीस्थान प्रकाशन एवं संकलन कर्ता आमिर हमजा जी मोबाइल के जमाने में हमें चिठ्ठियों तक ले जाने के लिए

 साधुवाद.


✒ प्राची

Tuesday, December 30, 2025

अलविदा 2025



ईश्वर की कृपा से एक और साल सही सलामत गुजर गया. कुछ सीख, कुछ खुशियां और नई आशाएं देकर गया ये साल 2025. दिसंबर के कोहरे भरे दिन और ठिठुरन भरी रातों के बीच हर साल ऐसे हीं चुपके से विदा लेना चाहता है और हम मनुष्य कुछ उठा नहीं रखते उसकी शांतिपूर्ण अलविदा को कोलाहल से भर उठाने में. हालांकि समय का पाबंद ये साल हमारे काउंट डाउन के बिना भी ठीक 31 दिसंबर को विदा ले हीं लेगा. ये तो कभी नहीं सुना कि घने कोहरे की वजह से जानेवाले साल की ट्रेन या फ्लाइट कैंसिल हो गई या डिले हो गई.
लेटलतिफी हम मनुष्यों का शगल है. समय तो समय का पाबंद होता है.
काफी समय से 2025 ▶️ 2026 के पोस्ट सोशल मीडिया पर देख रही हूँ. अपनी लेटलतिफी की वजह से अभी तक कुछ लिखा नहीं था पर आज ठिठुरन भरी शाम में एक गज़ल सुन लिया, "है कुछ उस पार मेरा भी, है कुछ इस पार तेरा भी..." सुनकर पहले रुलाई आई, फिर मुस्कुराहट. पता नहीं क्यों इन शब्दों ने बड़ी राहत दी. शब्दों से हीं तो संचालित होती हूँ मैं. इतनी काबिलियत तो अबतक नहीं आई कि इन शब्दों को साशय स्पष्ट कर सकूं, पर इस गज़ल ने बड़ी राहत दी. तब से अबतक लूप पर यही गज़ल सुन रही हूँ. 
सोचा 2025 को अलविदा इसी गज़ल से बोल दूं. साल 2025 की सीमा रेखा के उस पार साल 2026 में है कुछ मेरा भी...

Sunday, September 14, 2025

हिन्दी है तो मैं हूँ 


आज हिन्दी दिवस है.
आज हीं के दिन संविधान सभा ने ये निर्णय लिया था कि हिन्दी हमारी आधिकारिक भाषा होगी, इसीलिए ये दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है; ये बात हम सबको मालूम है.
सुबह से शुभकामना संदेश प्राप्त हो रहे हैं. 
इन संदेशों में सिर्फ एक संदेश ऐसा प्राप्त हुआ है जिसमें बिना किसी लाग लपेट, बिना किसी राग द्वेष के सिर्फ हिन्दी दिवस की शुभकामना है. मन प्रसन्न हुआ शुद्ध रूप से हिन्दी दिवस को समर्पित ये संदेश पढ़कर.
अधिकतर संदेशों और Social Media पर लगाए गए status को पढ़कर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो कोई जंग छिड़ी हुई है हिन्दी की दूसरी भाषाओं के साथ; मानो फलां भाषा ने हिन्दी भाषा को बड़ी दयनीय स्थिति में पहुंचा दिया है; मानो दूसरी भाषा को कोसे बिना हिन्दी दिवस के मायने खत्म हो जाएंगे.
क्यों?
ये प्रतिस्पर्धा हमारे दिमाग की उपज है. भाषाएं हमारी अभिव्यक्ति का साधन हैं. जितनी ज्यादा भाषाओं में हम खुद को अभिव्यक्त कर पायेंगे उतना अच्छा होगा. पृथ्वी के उतने स्थानों पर घूमने में उतनी आसानी होगी. ये भी कहते हैं कि ज्यादा भाषाएं जानने से मानसिक विकास भी ज्यादा होता है.
तो, अपनी भाषा को गले लगाइए, उसे प्यार कीजिए, उसका सम्मान कीजिए किंतु किसी और भाषा से तुलना करके उसका अपमान मत कीजिए.
जब ब्रह्मांड की कोख में हर रंग रूप जाति नस्ल के मनुष्य; हर प्रजाति के जीव; हर किस्म की जलवायु और हर भौगोलिक विविधता के लिए स्थान है तो हम अपने मस्तिष्क में भाषाई विविधता के स्थान तो बना ही सकते हैं.
यकीन मानिए, विविध भाषाओं को जानकर हम विविध संस्कृतियों का अध्ययन कर सकते हैं, विविध सिनेमा का लुत्फ़ उठा सकते हैं और सतरंगी साहित्य का आनंद ले सकते हैं.
अतएव हिन्दी दिवस मनाने का ये कतई मतलब नहीं है कि बाकी भाषाओं को कोसा जाए. वैश्वीकरण के दौर में हर भाषा की अपनी उपयोगिता है. बल्कि यूं कहें कि जरूरत है. एक भाषा से सारे काम नहीं हो सकते. एक भाषा पर सारे कामों का बोझ डालना ठीक भी नहीं है. जिस भाषा में सिनेमा देख कर मजा आता है, जिस भाषा में साहित्य पढ़कर मजा आता है, जिस भाषा में अपने मन की बात ज्यादा अच्छी तरह कह पाते हैं उस भाषा में ये सारे काम कर लेंगे और जो भाषा पासपोर्ट पर लिखने की है उससे वो काम ले लेंगे. उपयोगितानुसार काम बाँट लेंगे तो झगड़ा खत्म हो जाएगा. हां, कोई खास भाषा न आने पर खुद को हीन समझना गलत है. 
 
अब आती हूँ हिन्दी भाषा से मेरे संबंध पर. वैसे तो मेरी मातृभाषा भोजपुरी है पर मेरे जीवन में भोजपुरी और हिन्दी का आगमन साथ साथ हुआ तो मातृभाषा का दर्जा हिन्दी को भी प्राप्त है.
जब कलम उठाई और क, ख, ग़ लिखना सीखा तो पहली रचना हिन्दी में ही लिखी और अबतक ज्यादातर हिन्दी में ही लिखती आ रही हूँ. अन्य भाषा का ज्ञान होने के बावजूद मेरी अभिव्यक्ति का सबसे सुविधाजनक माध्यम हिन्दी हीं है. मेरे उल्लास, दुःख, क्रोध, प्रेम इत्यादि हर भाव की अभिव्यक्ति का प्रमुख प्रमाणिक साधन हिन्दी ही है. सिनेमा सबसे ज्यादा हिन्दी में ही देखा है. साहित्य सबसे ज्यादा हिन्दी में ही पढ़ा है. कुछ अंग्रेजी में नहीं तो अन्य भाषा की हुई तो अनुदित कृति पढ़ी है. इस भाषा ने घर बैठे मुझे विश्व भ्रमण कराया है. मनुष्य होने का दर्जा हिन्दी ने दिलाया है मुझे. अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 को अमल में लाकर दिया है हिन्दी भाषा ने मुझे.
मैं अभिव्यक्त कर पाती हूँ इसीलिए मैं हूँ.
हिन्दी है तो मैं हूँ.


Saturday, September 13, 2025

रसोड़े से हमारा कुछ ऐसा नाता है 🥲☹️


रक्षा बंधन के दिन सबसे बड़ी दीदी ने सलाह दी कि सिर्फ इतवार नहीं, सप्ताह के बाकी दिन भी हरी सब्जियां खासकर करेला खाया करो. 
दीदी की बात मानते हुए जोश जोश में सोमवार को हीं श्री श्री Blinkit जी की सेवाएं ली और स्वभाव से अमधुर करेला जी का पदार्पण घर में हो गया. 

जिस जोशो खरोश से करेला जी का आगमन हुआ था, आज यानी शनिवार आते आते उतने हीं निर्विकार भाव से (किंतु माता अन्नपूर्णा से क्षमा माँगते हुए) इनको dustbin को अर्पित करना पड़ा. 

Buying green vegetables on Monday and throwing them in the dustbin on Saturday is a new form of adulting, I guess.
 (Never intended to disrespect the food.) 

रसोड़े से हमारा कुछ ऐसा नाता है 🥲☹️

✒ Prachi 

 

Friday, September 5, 2025

 HAPPY TEACHER'S DAY


It’s been 3 years officially.
And every single time I see confused faces transform into enlightened ones — I feel it's worth it.
Every time a former student messages me to say I’ve impacted her life — I know it's worth it.
Every lecture leaves me elated.
I smile as I watch my life come full circle:
From participating in a Moot court to judging one.
From volunteering at a Moot to organizing it.
From being a student- volunteer of the Legal Aid Clinic to becoming its Faculty Incharge.
Yes — the journey from student to teacher is beautiful.
And it's absolutely worth it.
Thank you, my dear students.
In the chaos of projects- submissions, presentations, and exams — you still find time to share your thoughts with me.
Whether through handwritten letters or heartfelt messages, you remind me why I chose this path.
These words...They are the oxygen I breathe.
Thank you, my darlings, for being there.
Happy Teacher’s Day to me.

Thursday, August 14, 2025

 आज़ादी मुबारक 



कुछ परंपराएं बहुत खूबसूरत होती हैं. इन्हीं खूबसूरत परंपराओं में से एक है स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का राष्ट्र के नाम संदेश. देश के अभिभावक का संबोधन देशवासियों के नाम. 
मैं बचपन से ये संदेश सुनती आ रही हूँ. तब से जब समझ में कुछ नहीं आता था. ये अलग बात है कि भाव विह्वलता के अतिरेक में बातें अब भी दिमाग से ज्यादा दिल तक पहुंचती हैं. लेकिन एक बात है जो हर बार खूब अच्छे से समझ आई है और वो है एक खुशनुमा एहसास. #Feelgood 
बचपन में हम रेडियो पर सुना करते थे, बाद में टीवी पर और अब YouTube पर. सुनने या देखने के साधन अब ज्यादा उपलब्ध हैं. रेडियो या टीवी के साथ एक अनुशासन होता था कि अगर छूट गया तो छूट जाएगा. अब हाथ में मोबाइल, टैब और लैपटॉप है तो सुरक्षा का भाव रहता है कि अगर छूट गया तो फिर देख सुन लेंगे, लेकिन छूटता नहीं है. अच्छी बात है कि अबतक ये अनुशासन बना हुआ है. 
सोचती हूँ इस अनुशासन के पीछे क्या भाव हो सकता है. राष्ट्रप्रेम अपनी जगह है, लेकिन शायद कृतज्ञता का भाव ज्यादा है. ज़िंदगी से कृतज्ञता इस बात की कि मैं एक आज़ाद देश में पैदा हुई, कि मेरा संविधान मुझे मूलभूत अधिकार देता है, कि मेरा कानून मुझे स्त्री होने का विशेषाधिकार प्रदान करता है, कि मुझे अभिव्यक्ति की आज़ादी है, कि मैं स्वतंत्र हूँ, कि मैं स्वच्छंद हूँ, कि मैं भारतीय हूँ.

शुक्रिया ज़िंदगी 

हर बार राष्ट्रपति के मुंह से "मेरे प्यारे देशवासियों" संबोधन सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. लगता है देश को मैं प्यारी हूँ. मुझे तो मेरा देश प्यारा है हीं.
जब राष्ट्रपति के संबोधन में देश की उपलब्धियां गिनाई जाती है तो मैं गौरवान्वित हो उठती हूँ. जब अतीत की गलतियों से सीख लेने की बात आती है तो मैं मन ही मन सजग होकर प्रण लेने लगती हूँ कि कम से कम अपनी तरफ से कोई गलती नहीं करूंगी. जब देश की समस्याओं और आतंक या आपदा पीड़ितों की बात आती है तो देश की साझा पीड़ा से मेरे आंसू लुढ़क पड़ते हैं.
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का यह संबोधन मुझे मेरे देश और देशवासियों से चमत्कारिक रूप से जोड़ता है. आम दिनों में जो शिकायतें सरकारी नीतियों या फैसलों से रहती है वो गायब सी हो जाती है. मन में बस कृतज्ञता का भाव रहता है.
शुक्रिया ज़िंदगी कि मैं स्वतंत्र हूँ, कि मैं स्वच्छंद हूँ, कि मैं भारतीय हूँ.
हम सबको आज़ादी मुबारक.

🖊️ प्राची 

Thursday, July 17, 2025

मेरी पसंद वाला रंग

 मेरी पसंद वाला रंग 


आसमान का सलेटी रंग,
और उसपर मंडराते सफेद काले बादल 
पेड़ के पत्तों का हरे से थोड़ा ज्यादा हरा रंग,
तनों और शाखाओं ने मानों लगाया काला काजल
भीगी हुई हवा का रंग
मुझे पसंद है बारिशों वाला रंग 

घने कोहरे से झांकते पेड़ों का हरा- सफेद रंग,
खुशबुओं से भरे साग सब्जियों के खेतों का रंग
कोहरे की चादर ओढ़े सरसों के फूलों का मुस्कुराता पीला रंग
बेतरतीबी से खड़े मटर और कतार में खड़े टमाटर के पौधों का रंग 
ठिठुरती हुई हवा का रंग
मुझे पसंद है जाड़ों वाला रंग

धूसर मिट्टी पर बिखरे झड़े हुए पत्तों का रंग
नई कोंपलों का रंग, 
आम के गिरे मंजर से सनी हुई मिट्टी का रंग
फगुनिया हवा के झोंको से बौराए जीवों का रंग 
गर्मी की आहटों का रंग 
मुझे पसंद है पतझड़ और बसंत वाला रंग 

सुबह का रंग, शाम का रंग
जीवन के हर भाव का रंग
उगते सूरज का रंग, ढलती शाम का रंग
दोपहर की तपिश का रंग, चांद की चांदनी का रंग
प्रकृति का हर रंग है
मेरी पसंद वाला रंग

Friday, March 28, 2025

 शहतूत


बचपन में खाए गए इस भूले बिसरे फल पर अचानक निगाह पड़ी... कुछ सेकंड्स लगे याद आने में कि ये तो शहतूत है.
ये वही है जिसे हम तूत कहा करते थे. Memory retrieval की इस धीमी प्रक्रिया में मैं तूत के ठेले से आगे निकल गई और फिर लौटकर आई. 
"भईया, ये शहतूत है न" 
फलवाले ने ऐसे घूरा मानो कह रहा हो, "ये बड़ी बड़ी आँखे किसलिए सजा रखी हैं अपने मुँह पर, जो हमसे पूछ रही हो"
अपने बेवकूफाना सवाल की शर्मिंदगी को छुपाते हुए हमने जल्दी से शहतूत खरीद कर बैग में रख लिए. 
घर वापस आकर सबसे ज्यादा हड़बड़ी खरीदी गई नई किताबों को पढ़ने की थी, लेकिन रोजमर्रा के काम चीख चीख कर अपनी तरफ बुला रहे थे, दिन भर की थकान हावी हो रही थी, चाय की तलब लगी थी और दीदी लगातार video call कर रही थी पुस्तक मेला से खरीदे गए खजाने के प्रदर्शन (आज की भाषा में Unboxing) के लिए. 
जाहिर सी बात है, दिलो दिमाग और शरीर ने आराम को चुना. बेतरतीबी से बैग एक तरफ पटक कर और चाय गटक कर मैं बिस्तर पर पसर गई. 
Video call पर नया खजाना देखा, दीदी ने लगभग हर किताब से कुछ पढ़ कर सुनाया और पता नहीं कब मैं सो गई... 
मीठी नींद से जब जागी तो रोजमर्रा के काम निपटाये और कुछ fruits खाने का सोचा... 

एकदम से याद आया, "बैग में तूत पड़े हैं" मैं बैग पर टूट पड़ी. 
ये फल इतना दुर्लभ तो है नहीं अपने देश में, पता नहीं मुझे इतने सालों से खाने को क्यों नहीं मिला... 

कुछ शहतूत खट्टे थे जिन्हे अंखियो से गोली मारते हुए खाया. इन खट्टे शाहतूतों ने बचपन की मीठी यादों में पहुँचाया. 

कौन कहता है Time- travel सिर्फ जादुई कहानियों में होता है 😊

Friday, February 28, 2025

 "छुक- छुक चले जीवन की रेल"



मुख्य पात्र: कुली, चायवाला, समोसे- पकौड़ी वाला, सफाई कर्मचारी, भिखारी, किताबवाला 
अन्य पात्र: कुछ यात्री (पति पत्नी) (4 Students) (3 बुजुर्ग) (पापा की परी) (प्रतिदिन यात्रा करने वाले 4 passanger) 
 
(पर्दा उठता है. मंच पर सभी मुख्य पात्र अपना काम कर रहे हैं. नेपथ्य से रेलवे- उदघोषिका (Announcement) की आवाज आती है.)

Railway Announcement:- यात्रीगण कृपया ध्यान दें. ये 'पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण मध्य रेलवे' का जीवनपुर रेलवे स्टेशन है. शरारतपुर से चलकर हरारतपुर को जानेवाली बकरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से मात्र 23 घंटे की देरी से प्लेटफार्म संख्या 1 पर, नहीं- नहीं 2 पर, शायद 3 या 4 पर आनेवाली है. यात्राओं को हुई असुविधा के लिए रेलवे को बिल्कुल भी खेद नहीं है. 

(नेपथ्य से पटरियों पर चलती रेल की आवाज आती है. सभी मुख्य पात्र और जोर शोर से अपना काम करने लगते हैं.)
(मंच पर यात्रियों का दल आता है. भीड़ बढ़ती है.)

चायवाला- चाय, चाय- चाय, चाय पी लो चाय. बच्चा पिए जवान हो जाए, बूढ़ा पिए हसीन हो जाए. Special chai special chai

समोसे वाला- पेट की आग बुझाओ, झोलदार समोसे खाओ. बाबू खाओ, भइया खाओ, अपनी बीवी को खिलाओ. छुटकू छुटकी को भी खिलाओ, समोसे... ताजा ताजा समोसे खाओ.

(Platform/मंच पर यात्रियों की भीड़ आ जाती है)

(Scene with पति पत्नी and समोसेवाला)
पति- अरे खिसियाये ही रहोगी क्या सारा दिन. चल तो रहे हैं तुम्हारे मायके. 
पत्नी- बड़ा न चल रहे हैं. मेरे बच्चों को तो आने नहीं दिए आपके मम्मी- पापा. कहने लगे मन नहीं लगेगा. अरे, बच्चों के नाना नानी को भी तो मन होता है ना बच्चों से भेंट करने का, लेकिन नहीं...
पति- अच्छा जाने दो, फिर कभी बच्चों के साथ जाना...
पत्नी- आए हाय, फिर कभी बच्चों के साथ जाना; बड़ा ना रोज मायके जाते हैं हम. साल में गिन कर दो तीन बार जाते हैं. चले जाएंगे तो घर का काम कौन करेगा. हुह
पति- अरे काहे झगडा कर रही हो. सब लोग देख रहे हैं. 
(तभी वहाँ समोसा वाला आ जाता है) 
समोसा वाला- का भईया, भौजी खिसिया गई क्या. ये लो गरम ताजा समोसे खिलाओ, नाराज भौजी को मनाओ. 
पत्नी- अरे इ काहे खरीद कर खिलाएंगे, इनका तो बस, पूरी पका लो, रास्ता का खाना बांध लो. ये नहीं होता कि कह दे आज खाना मत पकाओ, हम खरीद देंगे. हुह
(पत्नी नाराज होकर जाने लगती है. पति समोसे वाले पर गुस्सा करता है) 
पति- तुम तो  झगडा और बढ़ा दोगे. हटो
(पति अपनी पत्नी के पीछे भागता है. भिखारी लंगड़ाते हुए भीख मांगता है. अन्य यात्री मुख्य मंच पर आ जाते हैं) 

Railway Announcement:- यात्रीगण कृपया ध्यान दें. नाराज बीवी को और नाराज ना करें. समय रहते समोसे खरीद लें वरना आपके ऊपर गरम आलुओं की बरसात हो सकती है. 

(Scene with बुजुर्ग यात्री)
पहला बुजुर्ग - जैसे ये लड़ रही है न समोसा के लिए, हमारी मलकिन, अरे आपकी भौजी भी ऐसे ही लड़ती थी इमरती खाने के लिए... 
दूसरा बुजुर्ग- का कह रहे हैं भईया. भौजी कहाँ लड़ाकिन थी. अरे हमारे जमाने में कोई औरत ऐसे खुल्लेआम नहीं लड़ती थी. आजकल की पतोहिया सर चढ़ी, नाकचढ़ी आ रही है.
तीसरा बुजुर्ग- खाली पतोहिया काहे, बेटवा सब भी आजकल का कम है का? शर्म हया बेच खाया है. ये पीढ़ी ही बेकार है. अरे, एक हमारा जमाना था...

(उनकी बात अधूरी रह जाती है. वहां कूली आ जाता है और उनका सामान उठा कर ले जाने लगता है.
पहला बुजुर्ग:- ए बाबू, क्या कर रहे हो? 
कूली:- आइए बाबूजी, आपका सामान पहुंचा दें.
दूसरा बुजुर्ग:- अरे रुपया पैसा कितना लोगे, तय कर लो पहले. 
(कूली उनकी बात नहीं सुनता, जल्दी जल्दी जाने लगता है. दो बुजुर्ग घसीटते हुए उसके पीछे पीछे चलते हैं)
तीसरा बुजुर्ग:- ससुर इतना तेज चल रहा है, सामान लेकर भाग न जाए कहीं.

Railway Announcement- यात्रीगण कृपया ध्यान दें. यदि आप कूली से अपना सामान उठवाना चाहते हैं तो कृपया मैराथन दौड़ की practice करके आईए वरना आपका सामान आपसे बहुत पहले गंतव्य तक पहुंच जाएगा.

Group of students मंच पर आ जाते हैं)
(Scene with group of students and किताबवाला)

First student- बताओ यार, ट्रेन 23 घंटे लेट हो गई. अब एक दिन की class miss हो गई. एक दिन की class miss होने से पता नहीं कैसे attendance % बहुत कम हो जाता है. हमारी कोई गलती भी नहीं है. हमारी problem कोई नहीं समझता. 
Second student- मेरी तो मैम ने आज ही project - submission की last date रखी थी. अब late submission पर डांट पड़ेगी. मैम को लगेगा कि हम बहाना मार रहे. हमारी कोई गलती भी नहीं है. हमारी problem कोई नहीं समझता. 

(तभी इनके सामने एक किताबवाला आता है. उसने आधे शरीर पर magazines लटका रखा है और आधे पर चिप्स के पैकेट)

किताबवाला- लंबे सफर को छोटा बनाइए, बोर हो रहें हैं तो रोमांच लाइए. पढ़िए पढ़िए, मजेदार कहानियां पढ़िए. घर में छोटे बच्चों के लिए General knowledge की किताब ले जाइए. 
Third student- ए भईया सुनिए, बेच आप किताब रहे हैं और लेकर घूम रहें हैं चिप्स. क्यों? 
किताबवाला- आपको कौन सी किताब खरीदनी है दीदी?
Fourth student- बोरियत दूर करने के लिए हमारे पास मोबाइल है. किताब की जरूरत हमको नहीं है.
किताबवाला- आप पूछ रही थी न कि बेच आप किताब रहे हैं और लेकर घूम रहें हैं चिप्स. क्यों? क्योंकि आपलोग किताब नहीं चिप्स खरीदते हैं. बताइए, कितने पैकेट लेंगी?
All four students - four packets 
(किताबवाला अफसोस से सिर हिलाता है)
(तभी वहाँ पापा की परी कुली के सिर पर सामान रखे आती है)

(Scene with पापा की परी & कुली)
पापा की परी- Oh God. कितना crowd है यहाँ and this place is so dirty. पापा ने बोला भी था कि flight से जाओ but मुझे तो Reel with Rail बनानी थी, so I came here. कुली भाया, आप luggage के साथ यहाँ खड़े रहो, मैं Reel बना लूँ पहले. 
कुली- मैडम, उस गाने पर बनाइये ना, "हट जा सामने से, तेरी भाभी खड़ी है" आप सारा अली खान और हम वरुण धवन, चलती है क्या नौ से बारा
पापा की परी- भाया, you are so funny, मैं सबके साथ Reel बनाऊंगी. 

(तभी वहाँ कुछ daily passengers आ जाते हैं) 
(Scene with daily passengers) 
First passenger- देश का population इतना बढ़ते जा रहा है. नहीं तो पहले कहाँ इतनी भीड़ होती थी station पर. 
Second Passenger- सही कह रहे हैं. 25-30 साल से नौकरी कर रहे हैं हमलोग. रोज रोज सुबह की कोई गाड़ी पकड़ कर चले जाते थे, शाम की गाड़ी से चले आते थे. कभी कोई दिक्कत नहीं होती थी. 
Third passenger- ये भीड़ भी कोई भीड़ है. लग रहा है आपलोग महाकुंभ वाला भीड़ भगदड़ देखे ही नहीं हैं.
Fourth passenger- भगदड़ तो अब होगा, वो देखिये TT आ रहा. बताइये महाराज, अब रोज रोज का यात्री भी ticket लेगा. इ ससुर अब 100-50 लेकर बात खत्म भी नहीं करता. चलिए, भागिये. 
(चारों भागते हैं) 

Railway Announcement:- यात्रीगण कृपया ध्यान दें. शरारतपुर से चलकर हरारतपुर को जानेवाली बकरी एक्सप्रेस चलने को तैयार है. यात्रियों से निवेदन है कि अपना अपना स्थान ग्रहण करें. 

(फिर से हलचल और ट्रेन का जाना, create the scene with sound effects not actual train)

(सारे यात्री मंच से चले जाते हैं. सभी मुख्य पात्र मंच पर रह जाते हैं. कुछ मुख्य पात्रों का डायलॉग)
सफाई वाला- देखत हो भईया, जैसे रेलगाड़ी आवत है जावत है, वैसे ही धरती पर आदमी जन आवत है जावत है, हो हल्ला मचावत है, गंदगी फैलावत है और कहानी खतम. 

भिखारी- अरे सब लोग कहाँ गंदगी फैलावत है, तोहार जैसा कुछ लोग सफाई भी तो करत है. 

सफाई वाला- हाँ ससुर, हमार जैसा लोग ही सफाई करत. तोहार जैसन नहीं ना कि हाथ पैर सलामत और जबरदस्ती का लंगड बन कर भीख मांगत. 

भिखारी- अरे बबुआ, ईमानदारी का जिनगी का होई. तनिक नमक मिलावा. तनिक झूठ फरेब का मसाला डाला. सुखा फीका जिनगी में कौन मजा. 
(भिखारी आँख मारता है) 
(तभी फिर से Announcement होती है)

Railway Announcement- यात्री कृपया ध्यान दें. ये 'पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण मध्य रेलवे' का जीवनपुर रेलवे स्टेशन है...
सभी एक साथ:- यात्रियों को हुई असुविधा के लिए रेलवे को बिल्कुल भी खेद नहीं है.
(सभी मुख्य पात्र फिर से अपना काम करने लगते हैं. पर्दा गिरता है.)

The End



Monday, January 20, 2025

 तृतीय प्रकृति: अस्तित्व से अस्मिता तक

(NALSA vs. UOI में पढ़े गए तथ्यों का नाट्य रूपांतरण)

Scene 1

(5 Transgenders come on the stage with a girl. They are clapping and singing.)

“अकाल मृत्यु मरता काम करता जो चांडाल का,

काल भी उसका क्या बिगाड़े भक्त जो महाकाल का”

(Then enters a girl named Shubhangi who looks upset)

मंगला (1st TG)- अरे शुभांगी बिटिया, तू उदास क्यों है? अरे तेरी मां और चारों मौसियां तेरी खुशी के लिए ही तो जीती है. 

शुभांगी (the Girl)- अरे मां, स्कूल में सब मुझे चिढ़ाने हैं. कहते हैं तेरी मां न मर्द है न औरत. धरती पर मर्द और औरत ही रहते आए है.

गौरा (2nd TG)- अरे कौन कहता है ऐसा. सुन बिटिया, जो ऐसा कहता है उसको हमारा इतिहास पता ही नहीं है. औरत और मर्द के अलावा तृतीय प्रकृति यानि हम भी तो रहते आए है हमेशा से. अरे, हमारे अस्तित्व पर तो स्वयं भगवान राम ने मुहर लगाई थी.

शुभांगी (the Girl)- अच्छा, वो कैसे मां?

लक्ष्मी (3rd TG)- सुन बिटिया, त्रेता युग की बात है, भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वनवास को चले. 

Scene 2

(Ram, Lakshman and Sita appear on the stage wearing Gerua. A few people come behind crying and making noise.)

सबलोग एक साथ- प्रभु, आप अयोध्या छोड़कर ना जाएं.

राम- मैं पिता के वचनों से बंधा हुआ हूँ. चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके मैं लौट आऊंगा. सभी नर और नारी घर चले जाएं. 

(Ram, Lakshman and Sita go towards another side of the stage and come back. Meanwhile some people leave the stage but two of them are still there.)

1st Person- राजा राम ने सभी नर और नारियों को घर जाने का आदेश दिया है.

2nd person- किन्तु हम न तो नर हैं और न हीं नारी. तो यहीं रुककर प्रभु के आदेश की प्रतीक्षा करते हैं.

(Then Ram, Lakshman and Sita come back)

लक्ष्मण- चौदह वर्षों बाद हम अयोध्या लौटे हैं.

सीता- अरे प्रभु, ये देखिए, ये किन्नर आपकी प्रतीक्षा में चौदह वर्षों से यहीं खड़े हैं.

राम- आप सबकी भक्ति से मैं भावविह्वल हूँ. मैं आपको आशीर्वाद देता हूँ कि आप एक शुभंकर जीव बनेंगे और आप जिसको भी आशीर्वाद देंगे वो फलित होगा.

(All the characters from Ramayan leave the stage. Present characters come centre stage.)

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शुभांगी (the Girl)- अरे वाह मौसी. तुम्हारे अस्तित्व पर तो वाकई भगवान राम ने मुहर लगाई, पर मेरा क्या… सब कहते हैं मैं मां के पेट से नहीं जन्मी.

मंगला (1st TG)- अरे बेटी, तू मेरे पेट से नहीं, मेरे दिल से जन्मी है रे. मेरे भी सीने में मां का दिल है. 

त्रिलोकी (4th TG)- बेटी तुझे पैदा करने वाली मां जब मर गई तो तेरी इस मां ने तुझे गोद ले लिया. ऊपरवाला जानता है बेटी, पूरी ममता से पाला है तुझे तेरी इस मां ने.

शुभांगी (the Girl)- मेरी प्यारी मां. 

    अच्छा मौसी, और कहानी सुनाओ न.

लक्ष्मी (3rd TG)- सुन बिटिया, द्वापर युग में महाभारत युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब पांडवों की हार लगभग तय हो चुकी थी.ऐसे समय में राजपुत्र के नरबलि देने की बात आई. इसी समय अर्जुन एवं उलूपी पुत्र इरावन अपनी बलि देने के लिए सामने आया लेकिन उसने एक शर्त रखी कि वो अविवाहित नहीं मरना चाहता. 


Scene 3

(Krishna and Eravan enter the stage)

इरावन- मैं इरावन, अपने कुल की रक्षा के लिए मैं मां काली के सामने अपनी बलि देने को तैयार हूँ, किन्तु मैं अविवाहित नहीं मरूंगा.

कृष्ण- तथास्तु. तुम्हारा विवाह अवश्य होगा.

कृष्ण (थोड़ा आगे बढ़कर)- अब एक दिन की सुहागन और फिर विधवा बनने के लिए तो कोई कन्या तैयार नहीं होगी. अतः, मैं स्वयं स्त्री रूप धारण करुंगा और इरावन से विवाह करूंगा. उसकी मृत्यु के उपरांत मैं विलाप भी करूंगा. कृष्ण के मोहिनी बनने का समय आ गया है. 

(Krishna leaves the stage and enters Mohini. Mohini is holding a mysterious smile and is dancing. She goes to Eravan.)

मोहिनी- मैं आपसे विवाह करने को तैयार हूँ.

(Mohini and Eravan dance together and while dancing they go towards the statue of Goddess Kali. Eravan sacrifices himself and Mohini mourns.)

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लक्ष्मी (3rd TG)- तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में इरावन का मंदिर आज भी बना हुआ है.

(The Characters from Mahabharat leave the stage. Present characters come centre stage.)

शुभांगी (the Girl)- बड़ी दिलचस्प कहानी है मौसी. लेकिन इतने समृद्ध इतिहास के बावजूद सबलोग मजाक क्यों उड़ाते हैं ? 

नैना (5th TG)- अरे वो तो अंग्रेजों के राज में हमारी स्थिति खराब हुई. उन्होंने the Criminal Tribes Act, 1871 बनाया जिसके तहत सारे हिजड़ा लोगों को अपराधी मान लिया गया था. 

गौरा (2nd TG)- दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी हमारी स्थिति खराब ही रही जबतक NALSA VS. UOI के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हमारे अस्तित्व पर मुहर नहीं लगा दी. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हमें third gender माना और socially and educationally backward classes of citizens का दर्जा दिया. लेकिन ये सरकार अबतक हमको सही तरीके से reservation नहीं दी है.

मंगला (1st TG)- ऊपर से ये अमरीका वाला कह रहा है कि धरती पर सिर्फ आदमी और औरत ही रहते हैं. हुंह... बौड़म कहीं का.

त्रिलोकी (4th TG)- अब तो श्री गौरी सावंत, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, अभिना अहर, मंजमा जोगती, शबनम मौसी से लेकर त्रिनेत्र हालदार तक कितने ही हम जैसे लोग हैं जो हमें प्रेरित करते हैं. 

सभी TG एक साथ- तो ये है हमारी यात्रा, अस्तित्व से अस्मिता तक. 

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Note:- Boss ordered me to get our students perform a skit on the theme Transgender. First, I was hesitant to write anything due to my negligence on this topic. 

Then, the judgement of Honorable SC rescued me. I read the judgement and wrote everything I learnt from it. Hope, I have not hurt sentiment of anyone. 

Title courtesy:- Saumya Krishna Ma'am 



Friday, December 27, 2024

 A Humble Tribute 


In the year 2010, I had the opportunity to meet him at PM's Residence. 
He came towards us and asked in his most humble and generous yet firm voice, "नमस्ते, कैसे हैं आप?" 
His presence was not intimidating, though the teachers with us and the security personnel had made it tense; he was quite normal. We, the students were in Awwww... How can a PM be so humble.
I sat right behind him for photo shoot. 
I could feel his innocent energy...
The photo is blurred over years and so is my vision because of tears.
Yes sir, the History should be kind to you 🙏

Wednesday, December 25, 2024

मैं, मेरी यात्रा और बूंदों का शोर


प्रयागराज जंक्शन से ट्रेन खुली और तुरंत ही गंगा मईया के दर्शन हुए. ट्रेन अपनी गति से दौड़ रही थी और गंगा मईया अपनी गति से. मैंने हाथ जोड़े. गंगा मईया मुस्कुराई. "बंगाल जा रही हो न, मैं भी वही जा रही." 

तभी एक नन्ही बूंद ने चिढ़ाया- "तुम हमसे पहले पहुंचेगी या बाद" 

मैंने कहा- "मैं तो रेल की गति पर निर्भर हूँ, तुम्हारे जैसी स्वच्छंद कहां" 

अब बहुत सी बूंदों ने एक साथ चिढ़ाया- "हुह, तुम क्या जानो स्वच्छंदता, तुम क्या जानो अल्हड़पन का स्वाद, तुम क्या जानो कड़ी धूप, शीतल चांदनी और तेज हवा में यात्रा का आनंद, तुम क्या जानो प्रकृति का सान्निध्य... तुम आत्मनिर्भर नहीं; फंसी हुई हो सुविधाओं के जाल में"

इतने में ट्रेन पुल पार कर गई. पर स्वच्छंद बूंदों का शोर दिमाग में बना रहा. मैं बैठी खिड़की से बाहर भागते दृश्यों को देखते हुए सोचती रही. सच में ये कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, लेकिन कौन पहले पहुंचेगा. अगर मैं पहले पहुंच भी गई तो क्या हासिल कर लिया. कंबल तानकर सोई और अगली सुबह उठी तो गंतव्य पर पहुंच गई. यात्रा का आनंद सच में नहीं लिया. बरबस ही राहुल सांकृत्यायन जी की याद आई. पदयात्रा का विचार मन में आने लगा. ठीक उसी वक़्त यथार्थ से भी साक्षात्कार हुआ. नौकरी करता व्यक्ति अगर पदयात्रा पर निकल पड़े तो नौकरी खतरे में पड़े. ठीक कहा था बूंदों ने, मैं स्वच्छंद नहीं. #RealityCheck

बाहर अंधेरा होने लगा था, सहयात्री सोना चाह रहे थे. मैंने भी कंबल तानकर मेरे सर्वप्रिय लेखकों में एक रस्किन बॉन्ड की किताब निकाल ली. मन में बूंदों का शोर बना रहा. मस्तिष्क अपने बचाव के बहाने ढूंढता रहा. "हां तो ठीक तो है, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, पानी का जहाज या किसी भी तरह के संचार माध्यम का आविष्कार मनुष्य ने ही तो किया है. तो अगर मनुष्य उनका लाभ उठा ले तो क्या बुराई है. हज़ार कामों और डेडलाइन्स के मकड़जाल में फंसा मनुष्य कहां कर पाएगा स्वच्छंद पदयात्रा!"

तमाम तार्किक बातों के बावजूद भी मन शांत नहीं हो पा रहा था, यहां तक कि रस्किन बॉन्ड की प्यारी रचनाएँ भी आज सुकून नहीं दे पा रहे थीं. बूंदों का शोर अनवरत जारी था, "तुम स्वच्छंद नहीं..."

मैंने किताब बंद करके करवट बदली. सहयात्रियों की गतिविधियों पर ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश की. भाषाई बाध्यता थी, वो लोग बांग्ला में बातें कर रहे थे. बीच- बीच में थोड़ी अंग्रेजी और जरूरत पड़ने पर बहुत थोड़ी सी हिन्दी. ऐसा नहीं है कि मुझे सहयात्रियों की बातें जानने में कभी भी बहुत रुचि होती है, पर कानों में पड़ी आवाज का मतलब नहीं समझ आना अजीब लग रहा था. पता नहीं क्यों आवाज सुनते हुए भी न समझ पाने की खीझ हावी होने लगी. मैंने ईयरफोन लगा लिया और गाने सुनने लगी. संगीत मुझे हमेशा से शांति प्रदान करता है. नींद आने लगी थी, तभी फोन बज उठा. एक सहकर्मी की कॉल थी... काम से संबंधित. दिमाग में बूंदों का शोर फिर से शुरू हो गया. सहकर्मी से मैंने हूँ हां करके बात की. वैसे भी मैं यात्राओं के दौरान रिजर्व रहना पसंद करती हूँ, आज और ज्यादा सतर्कता थी कि जिन सहयात्रियों की बातें मुझे समझ नहीं आ रही, उन्हें मेरी बातें पता ना चल जाएं... उफ्फ, हम मनुष्य और हमारी दुश्चिंताएं.  

उसके बाद एक एक करके घरवालों की कॉल आई. उन्हें यात्रा की दौरान ना बात करने वाली मेरी आदत पता है, तो जल्दी जल्दी बात हो गई. कई लोगों के वॉट्सएप मैसेज आ रखे थे, वैसे तो यात्रा के दौरान फोन चलाने में भी मुझे खीझ मचती है. गतिमान रेल के साथ मेरे विचार भी तीव्र गति से चलते हैं, पर अपने विचारों की तंद्रा भंग करके मैसेजेस का रिप्लाई देना जरूरी था वरना लोग बुरा मान जाते हैं. ये बात ज्यादातर लोगों की समझ से परे होती है कि किसी को मोबाइल फोन से भी खीझ हो सकती है. इस चक्कर में कुछ रिश्तेदार और कुछ दोस्त मुझसे रूठ चुके हैं और मैंने भी कभी उन्हें मनाने समझाने की कोशिश नहीं की. अब मैं जो हूँ, मैं वो हूँ. कम से कम इस बात की स्वतंत्रता तो रखूं मैं. बूंदे चाहे जितना हंसे मुझपर, स्वच्छंद तो हूँ मैं... कुछ मामलों में.

पता नहीं कब नींद आ गई. खूब गहरी नींद जो तेज आवाज़ से खुली. नीचे बर्थ वाली सहयात्री बहुत जोर जोर से बोल रही थी, भाषा समझ नहीं आई पर इतना समझ आया कि उनको गया स्टेशन पर कुछ काम रहा होगा क्योंकि बार बार गया का नाम आ रहा था. वो बहुत बेचैनी में टहलने लगीं. अपनी बेचैनी के बीच शायद उनको मेरे चैन से लेटे रहने से जलन हुई क्योंकि मेरी ओर देखकर बोली, "खूब शूतलो". 

मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी पर काबू पाया. दरअसल उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनके जोर जोर से बोलने पर मैं जाग गई हूँ, अधखुली पलकों से उनका परेशान चेहरा देख चुकी हूँ और अपने बारे में टिप्पणी भी सुन चुकी हूँ. उनके मुड़ते ही मैने कंबल से मुंह ढक लिया और बिना आवाज के हँस पड़ी. पता नहीं क्यों मुझे लगा मेरे साथ साथ बूंदे भी हँस पड़ी मानो कह रही हों- "ये होता है यात्राओं का असली आनंद. खलल वाली नींद और खीझ वाले पलों के बीच हँसी के मौके."

मैंने वक़्त देखा. अभी बारह भी नहीं बजे थे. वो महिला दुबारा किसी से फोन पर बात करने लगी थीं. अबकी बार आवाज थोड़ी संयमित थी. थोड़ी देर बात करने के बाद वो हँसने लगी. शायद गया स्टेशन पर उनका काम हो गया था. फोन रखकर वो बहुत जल्दी सो गईं. ट्रेन ने गति पकड़ी और मुझे भी दुबारा नींद आ गई.

रेल यात्रा और निर्विघ्न नींद शायद दो अलग चीजें हैं. अबकी बार नींद खुली M for Mango, N for Nest, O for Orange... सुनकर. रात के डेढ़ बज रहे थे. सामने वाले बर्थ पर बच्ची जग गई थी, मां बाप को जगा दिया था और उसको ज़ोर से पढ़ाई आई थी. यहाँ भी बाकी बातें बांग्ला में थी, समझ ना आई. इतना जरूर समझ आया कि मां बाप बड़ा लाड जता रहे थे बच्ची पर. नींद टूटने की खीझ कम हो गई और मन ही मन मां बाप के सब्र की सराहना करने लगी. साथ ही साथ बूंदों का ख्याल भी आया "इलाहाबाद से साथ चले थे, अभी पता नहीं कहां पहुंची होंगी बूंदे." मेरी ट्रेन के हावड़ा स्टेशन पहुंचने का समय था सुबह 05:45 बजे. अब चिंता होने लगी, ऐसे ही नींद में खलल पड़ता रहा तो पता नहीं सुबह नींद खुलेगी या नहीं. फिर ध्यान आया कि हावड़ा स्टेशन आखिरी पड़ाव है, शोर से नींद खुल ही जाएगी. 

सुबह वाकई शोर से ही नींद खुली. सारे लोग उतरने को तैयार थे. खिड़की से बाहर देखा तो हिन्दी, अंग्रेजी और बांग्ला में स्टेशन का नाम लिखा हुआ था. निगाहें बांग्ला भाषा पर अटक कर रह गईं. ये भाषा मैं नहीं जानती. मैं बहुत कुछ नहीं जानती. दुनिया में कोई भी सबकुछ नहीं जानता. दुनिया से 'जानकार' शब्द हटा देना चाहिए.

"अरे पगली, सबकुछ नहीं जानने में ही तो मनुष्य जीवन का आनंद है, वरना दुनिया से 'अचरज, अचंभा' इत्यादि शब्दों को हटाना पड़ेगा" अब मुझे लगने लगा था कि बूंदे गंगा मईया की लहरों को छोड़ कर मेरे दिमाग में ही तैर रही हैं. सर झटक कर मैं उतर पड़ी. 

हावड़ा स्टेशन का प्लेटफॉर्म 21 भोर के उजाले में मटमैला सा लगा. बहुत ज्यादा भीड़. अलग भाषा. कानों में आवाज आए पर मतलब का पता नहीं. पर एक आवाज सुनी और मतलब भी समझ आ गया, "आज छठो पूजा... भीड़ कोम" 

हां वो दिन छठ पूजा का था. सुबह वाले अर्घ्य का वक्त था पर होटल में चेक- इन का समय दो बजे था. यानि अभी नहाया नहीं जा सकता था. मैंने स्टेशन का जायजा लिया. दो तीन चक्कर लगाने के बाद कई चीजें समझ आ गईं. वेटिंग रूम पहली मंजिल पर था और अमानती समान गृह प्लेटफॉर्म 23 पर. गूगल मैप पर हावड़ा ब्रिज 100 मीटर की दूरी पर था. समान टिका कर मैं निकल पड़ी. 

पहला विचार- "इस जगह पर भीड़ बहुत है."

दूसरा विचार- "इस जगह पर बदबू बहुत है."

सर झटक कर नाक पर रुमाल रखा. बैग में मास्क रखना चाहिए था. कोरोना का डर चला गया और हम मास्क भूलने लगे हैं. 

खैर, सुंदर से हावड़ा स्टेशन के साथ सेल्फी खींच ली. ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज भी सामने नज़र आ गया. बहुत ज्यादा भीड़ और बहुत ज्यादा बदबू के बीच भी फोटो खिंचाना तो बनता था. मनुष्य घूमने इसीलिए जाता है कि फोटो खिंचाए और दूसरों को दिखाए. 

नाक दबाए वापस लौट पड़ी और वेटिंग रूम के लिए पहली मंजिल पर चढ़ पड़ी. चढ़ते ही हुगली मईया के दर्शन हो गए. गंगा की सहायक नदी हुगली. स्टेशन खत्म होते ही पीली टैक्सियों से भरी सड़क, फिर पार्किंग एरिया और फिर हुगली. सुबह की रौशनी में झिलमिलाती बूंदे.  

"एक मिनट, क्या ये वही बूंदे हैं जो इलाहाबाद में मिली थीं?"

"नहीं नहीं, ऐसा कैसे संभव है, गंगा की बूंदे हुगली में कैसे? सभी बूंदे एक जैसी दिखती हैं इसीलिए मुझे भ्रम हो रहा है."

फिर से सर झटक कर मैं वेटिंग रूम में चली गई. फोन चार्ज करने और थोड़ा आराम करने. आसपास घूमने की जगहों को गूगल पर ढूंढा तो सबकुछ 10 बजे खुलता था. 

आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान यानि कलकत्ता वनस्पति उद्यान जाना तय किया. हावड़ा शहर की बदबूदार सड़कों से होते हुए मैं शिबपुर इलाके में पहुंच गई. वनस्पति उद्यान में प्रवेश करते ही जन्नत का एहसास हुआ. इतना सुंदर, इतनी हरियाली, आहा, मजा आ गया.


लेकिन, अभी संघर्ष बाकी था. 

प्रवेश द्वार पर जो गार्ड थीं उनको सिर्फ बांग्ला भाषा आती थी. 15 मिनट की मशक्कत के बाद हम दोनों एक दूसरे की बात थोड़ी सी समझ पाए. उन्होंने मेरे बैग से बिस्किट और चिप्स के पैकेट हटवा दिए, पानी की खरीदी हुई बोतल हटवा दिया लेकिन फ्लॉस्क रहने दिया. तब समझ आया वो प्लास्टिक हटाने की बात कह रहीं. इसके अलावा उन्होंने बहुत सी बातें और कहीं जो शायद अंदर के नियम थे और मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आए. मैंने सोचा किसी साइनबोर्ड पर पढ़ लूंगी. भाषाई समस्या देश के बाकी राज्यों में भी आई थी, पर इस बार ज्यादा महसूस हो रही थी.

खैर... मुझे बरगद का पेड़ देखना था. 270 साल पुराना बरगद वृक्ष. मेरे रोमांच की सीमा ना थी. दीदी को वीडियो कॉल किया और चल पड़ी. चारों ओर हरियाली, करीने से सजे कतार में लगे अलग अलग प्रजाति के पेड़- पौधे और कई सारी झीलें. मज़ा ही आ गया. सीधा चल कर मैं बाईं ओर मुड़ गई. लगा ये रास्ता बरगद वृक्ष तक तक जल्दी पहुंचा देगा. इक्का दुक्का लोग ही थे अंदर. पैदल चलने में बहुत आनंद आ रहा था और तभी सामने नज़र आईं चमकती हुई बूंदे. अपने ऊपर बड़े से स्टीमर और कई छोटी छोटी नाव का बोझ उठाए. अच्छा, यानि बगल से हुगली नदी प्रवाहित हो रही थीं. एकदम हरे हरे पेड़ों के बीच से झांक कर एकदम सफेद पानी का प्रवाह देखना आनंददायी था. नवंबर महीने की धूप और हवा भली लग रही थी. मेरा रोमांच और बढ़ने लगा था. मन हो रहा था नदी की तरफ मुंह करके बैठ जाऊं और रवीन्द्रनाथ टैगोर जी का साहित्य पढ़ू. या राहुल सांकृत्यायन जी का कोई यात्रा वृत्तांत पढ़ू.  दीदी से इन्हीं बातों की चर्चा करते मैं आगे बढ़ने लगी. बीच बीच में मम्मी भी आकर उस वक़्त के किस्से बता दे रही थीं जब उन्होंने बोटेनिकल गार्डन देखा था. तब मम्मी नौवीं कक्षा में थीं. उम्र का बड़ा पड़ाव कितना अच्छा होता है न, आपके पास तमाम अनुभव होते हैं जो आप दूसरी पीढ़ी को बता सकते हैं. आज वाली बातचीत मुझे अच्छी लग रही थी. दीदी से साहित्य की बातें और मम्मी से उनके अनुभवों की बातें. 

मैं धन्य धन्य हो गई. शुक्रिया जिंदगी. 

मैं नदी के साथ वाली सड़क पर चल रही थी. दीदी और मम्मी से बात करते करते मैं बार बार अपनी बाईं ओर बहती हुगली की लहरों को देख ले रही थी. पता नहीं क्यों मुझे लग रहा था कि हुगली की बूंदों को गंगा की बूंदों ने सारी बातें बता दी थीं और अब ये बूंदे मेरे यूं स्वच्छंद विचरण करने पर मुझे शाबाशी दे रही थीं. इनका नेटवर्क बड़ा मजबूत है, सारी बूंदे एक दूसरे से अटूट रूप से जुड़ी जो हैं. तभी मुझे हुगली नदी सप्रेम मुस्कुराती नज़र आई मानों मेरे विचारों को पढ़ लिया हो. मैं वैसे भी सदैव हीं प्रकृति माता की शक्तियों के आगे नतमस्तक रहती हूँ, आज भी घुटने टेक दिए. 

एक बेंच पर अपना सामान टिका कर मैंने हुगली माता के साथ फोटो खींचा ली और वीडियो बना लिया. 


प्रफुल्लित, पुलकित, आह्लादित, आनंदित मन से मैं वनस्पति उद्यान की सुंदरता और अपने जीवन की सार्थकता की सराहना कर ही रही थी कि फोन बज उठा.

एक सहकर्मी की कॉल थी. "मूट कोर्ट हॉल खुल गया है और वहां पुताई का काम हो रहा है."

मैं अपनी काल्पनिक दुनिया से यथार्थ में लौट गई. सबसे पहले डर लगा. अभी थोड़ी देर पहले जो बूंदे मेरे स्वच्छंद विचरण के लिए मुझे शाबाशी दे रही थीं, अब फिर से मुझे चिढ़ाएंगी. मैंने कनखियों से हुगली की तरफ देखा. बूंदे शांत थीं. 

"अच्छा, यानि नटखट बूंदे कल रात से आज दोपहर होते होते मैच्योर हो गईं." 

"नहीं नहीं, जरूर ये शांति इन बूंदों की किसी बड़ी साजिश के पहले की शांति है."

मैं अब दाहिनी ओर मुड़ गई. मैंने साइनबोर्ड ढूंढा. मैप के हिसाब से बरगद वृक्ष आसपास ही था, पर पता नहीं क्यों नज़र नहीं आ रहा था. इक्का दुक्का लोगों से पूछने की कोशिश की पर भाषाई समस्या... अब मैं चलते चलते थकने लगी थी. पानी भी खत्म होने लगा था. खाने को तो कुछ था ही नहीं पास में. अब दोपहर की धूप भी चुभने लगी थी. एक सेकंड को सोचा, वटवृक्ष देखे बिना लौट जाऊं क्या. अगले ही पल सोचा, पता नहीं दुबारा कब आने का मौका मिले. हिम्मत बटोर कर फिर चल पड़ी.

... और सामने नज़र आया अपने जीवन के 270 वसंत देख चुका विशालतम बरगद. मैं मंत्रमुग्ध सी उस ओर चल पड़ी. 


वैसे तो भूख प्यास से बुरा हाल था, पर इस 270 साल के बुजुर्ग को देखकर अपनी युवावस्था को जागृत किया और हंसते मुस्कुराते फोटो खिंचाने लगी. मम्मी की यादें फिर ताजा हुईं, कहने लगी, "पहले लोग शाखाओं पर अपने नाम लिख दिया करते थे"

अच्छा, तभी अब इस वृक्ष को चारों ओर से घेर दिया गया है. सही किया, वरना अपने लंबे जीवनकाल में ये पेड़ पता नहीं कितने लोगों के नाम का टैटू अपने शरीर पर ढोता. हालांकि मेरी इस बात की बड़ी इच्छा हो रही थी इसकी छाया में बैठकर बातें करूं. पूछूं कि इतने सालों में क्या क्या महसूस किया. क्या मनुष्य वाकई सभ्यता की ओर उन्मुख है या और बर्बर होते जा रहा है. मौसम कितना बदला है. भाषा, पहनावा, रहन सहन, खान पान कितना बदला है.

पेड़ मौन रहा. गंभीर रहा, मानो कह रहा हो, "अपने सवालों के जवाब खुद ढूंढ़ो"

धूप बहुत तेज हो गई थी. मैं वापस चल पड़ी. इरादा ये था कि जल्दी से मेन गेट तक पहुंच जाऊं. साइनबोर्ड पर तरह तरह के बगीचों का जिक्र था, पर अब और चलने की ताकत नहीं बची थी. 

बूंदों ने फिर चिढ़ाया, "बड़ी आई खुद को राहुल सांकृत्यायन जी की पदयात्राओं की फैन कहनेवाली"

अब आगे बढ़ते हुए मेरे दिमाग में जो मैप बन रहा था वो ये था कि मेन गेट से मैं बाएं मुड़ी थी, फिर दाएं फिर एक और बार दाएं तो अब फिर से दाईं ओर मुड़ने पर मेन गेट आ जाएगा. यही सोच कर दाईं ओर मुड़ पड़ी, जल्दी ही एक गेट आ भी गया, पर ये वो गेट नहीं था जहां से मैंने प्रवेश किया था और जहां मेरा बाकी सामान रखा हुआ था. वहां के गार्ड से मैंने पूछा... फिर वही भाषाई समस्या. इशारों इशारों में जितनी बात समझ आई, उस रस्ते मैं फिर से चल पड़ी. 

रास्ता भटकने से कोई घबराहट नहीं हो रही थी. बस भूख और थकान से बुरा हाल था. लेकिन नज़ारे बहुत सुंदर थे. बीच बीच में कई सारी झीलें थीं. पानी की बूंदे मेरा पीछा नहीं छोड़ रहीं थी इस बार. मन ही मन ये वादा करते हुए कि दुबारा बहुत सारा समय लेकर यहां आऊंगी और बैठकर साहित्य पढूंगी, या फिर इन बूंदों से JURISPRUDENCE जैसे गंभीर विषय पर चर्चा करूंगी, इन्हें Doctrine of Social- Solidarity समझाऊंगी कि मनुष्य तुम्हारे जैसा स्वच्छंद नहीं हो सकता क्योंकि हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं; मैं सही गेट पहुंच गई. 

होटल में चेक इन का वक़्त भी हो चुका था. हावड़ा स्टेशन पहुंच कर अमानती सामान गृह से अपना सामान उठाया, कैब बुक किया और सोचा थोड़ी देर में होटल पहुंच कर नहा धुला कर थोड़ा आराम करके कोलकाता शहर में एक दो जगहें और घूम लूंगी क्योंकि अगले दो दिन तो इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस अटेंड करना था और उसी रात वापसी का टिकट था.

लेकिन...

अभी भाषाई संघर्ष बाकी था. कैब ड्राइवर से ठीक से संवाद नहीं हो पा रहा था. हमलोग कमर्शियल पार्किंग 2B पर खड़े थे, न मैं ड्राइवर को अपनी बात समझा पाई न उसकी समझ पाई. उसने कैब कैंसिल की. पेनाल्टी मुझपर लगी. ऐसे ही करके एक घंटे की मशक्कत के बाद एक कैब बुक हो पाई और मैं हावड़ा से कोलकाता पहुंच पाई.

थकान से बुरा हाल था. सोचा, गरम पानी से नहा लेती हूँ, थकान उतर जाएगी. 

लेकिन...

मेरा शक सही था. अभी बूंदों की साजिश का वक़्त था. बाथरूम में नल कुछ ऐसे लगे थे कि बंद नहीं हो पा रहे थे. नल तो ठीक ही लगे होंगे क्योंकि मेरी दोस्त नहाई थीं तो सही से बंद हो गए थे. मुझे समझ आया, ये बूंदे गंगा से निकल कर हुगली तक और अब मेरे बाथरूम तक मुझसे ठिठोली करने के मूड में हैं. गरम पानी के भाप से पूरा बाथरूम भर गया था. रूम सर्विस बुलानी पड़ी नल बंद करने के लिए. 

उस वक़्त तो बूंदों ने मुझसे ही साजिश की, पर अगली सुबह जब मेरी दोस्त नहाने गईं तो उनसे भी ठिठोली कर बैठी ये बूंदे. फिर से रूम सर्विस बुला कर नल बंद कराया.

हद होती है मतलब. स्वच्छंदता को लेकर मुझे चिढ़ाने तक तो ठीक था, पर अब यूं परेशान करना... लेकिन हम कर भी क्या सकते थे. बूंदों की शरारत के बीच नहा धुला कर कॉन्फ्रेंस अटेंड करने चले गए. 

बूंदों की ये शरारत अगली सुबह भी चली. फिर हम चेक आउट कर गए, दिन में कॉन्फ्रेंस अटेंड किया और शाम को वापस हावड़ा स्टेशन पहुंच गए. ट्रेन आने में अभी वक़्त था. गूगल पर पढ़ रखा था कि हावड़ा के घाट बड़े सुंदर हैं. फिर से अमानती सामान गृह में सामान टिका कर हम निकल पड़े.

लेकिन....

"यहाँ बदबू बहुत है"

"यहाँ भीड़ बहुत है"

"चलो वापस स्टेशन ही चलते हैं"

हुगली माता को प्रणाम किया. मन ही मन पुरजोर गुजारिश की बूंदों से कि अब बस करो, बहुत चिढ़ा लिया इस बार.

हुगली की लहरें शांत रहीं. बूंदों ने फुसफुसा कर कहा, "चलो, ठीक है. अब सही सलामत घर जाओ. फिर कभी अठखेलियां करेंगे... फिर कभी तुम्हारे विचारों को झकझोरेंगे... फिर कभी तुम्हारे दिमाग में शोर मचाएंगे... फिर कभी..."



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