शहतूत
बचपन में खाए गए इस भूले बिसरे फल पर अचानक निगाह पड़ी... कुछ सेकंड्स लगे याद आने में कि ये तो शहतूत है.
ये वही है जिसे हम तूत कहा करते थे. Memory retrieval की इस धीमी प्रक्रिया में मैं तूत के ठेले से आगे निकल गई और फिर लौटकर आई.
"भईया, ये शहतूत है न"
फलवाले ने ऐसे घूरा मानो कह रहा हो, "ये बड़ी बड़ी आँखे किसलिए सजा रखी हैं अपने मुँह पर, जो हमसे पूछ रही हो"
अपने बेवकूफाना सवाल की शर्मिंदगी को छुपाते हुए हमने जल्दी से शहतूत खरीद कर बैग में रख लिए.
घर वापस आकर सबसे ज्यादा हड़बड़ी खरीदी गई नई किताबों को पढ़ने की थी, लेकिन रोजमर्रा के काम चीख चीख कर अपनी तरफ बुला रहे थे, दिन भर की थकान हावी हो रही थी, चाय की तलब लगी थी और दीदी लगातार video call कर रही थी पुस्तक मेला से खरीदे गए खजाने के प्रदर्शन (आज की भाषा में Unboxing) के लिए.
जाहिर सी बात है, दिलो दिमाग और शरीर ने आराम को चुना. बेतरतीबी से बैग एक तरफ पटक कर और चाय गटक कर मैं बिस्तर पर पसर गई.
Video call पर नया खजाना देखा, दीदी ने लगभग हर किताब से कुछ पढ़ कर सुनाया और पता नहीं कब मैं सो गई...
मीठी नींद से जब जागी तो रोजमर्रा के काम निपटाये और कुछ fruits खाने का सोचा...
एकदम से याद आया, "बैग में तूत पड़े हैं" मैं बैग पर टूट पड़ी.
ये फल इतना दुर्लभ तो है नहीं अपने देश में, पता नहीं मुझे इतने सालों से खाने को क्यों नहीं मिला...
कुछ शहतूत खट्टे थे जिन्हे अंखियो से गोली मारते हुए खाया. इन खट्टे शाहतूतों ने बचपन की मीठी यादों में पहुँचाया.
कौन कहता है Time- travel सिर्फ जादुई कहानियों में होता है 😊