“नूह का कबूतर”: एक सुंदर किताब
साल 2026 की एक सुंदर शुरुआत हुई. “नूह का कबूतर” पढ़ने की चाह थी. दोस्त को अपनी चाहत बताई थी कि खरीदनी है. आज सत्र के पहले दिन ये सारी चीजें उपहार स्वरूप प्राप्त हुई. खिली हुई बांछे और जल्दी जल्दी सारी चिट्ठियों को पढ़ने की बेचैनी एकसाथ मेरे चेहरे पर नजर आई. घर आकर सबसे पहले दीदी को फोन किया और बाबुषा कोहली की पाती पढ़कर सुनाया. फिर ईदगाह के हामिद को लिखा पैगाम पढ़ा. अब पढ़ने की जल्दी से ज्यादा स्थिरता का अनुभव हो रहा. ये जल्दी जल्दी पढ़कर खत्म कर देने वाली किताब नहीं है बल्कि स्थिर मन से बैठकर आहिस्ता आहिस्ता ग्रहण करने लायक ग्रंथ है. एक एक किरदार के जीवन के उतार चढ़ाव को शब्दों के माध्यम से सब्र के साथ देखने की कवायद है ये किताब.
हम चिट्ठियों के जमाने के ही तो हैं. लैंडलाइन फोन पर तफसील से बात नहीं हो पाती थी. मोबाइल का पदार्पण जीवन में बहुत बाद में हुआ. अपना बचपन चिट्ठी पाती के भावात्मक संदेशों से घिरा हुआ था. कभी फूआ की चिट्ठी कभी मौसी की पाती. कभी खुशखबरी लाते, कभी जीवन की परेशानियाँ बयान करते खत. उनका जवाबी पैगाम लिखने की कवायद. लिफाफे, अन्तर्देशीय इत्यादि पर लिखे गए संदेश. कम शब्दों में ज्यादा बयां करने की कला सिखाते पत्र.
पत्रिकाओं में पढ़कर पेन फ्रेंड का कांसेप्ट सीखा था. मेरा कोई पेन फ्रेंड कभी नहीं रहा पर उन दिनों बहुत मन होता था कि काश हामिद का पता मिल जाता तो उस से पत्र व्यवहार होता. हलकू से बात करने की इच्छा होती थी और उसके जबरा से भी. इच्छा होती थी उन नीलगायों को अनुनय विनय भरा संदेश भेजने की कि हलकू का खेत ना खाओ. असंख्य किरदार जो बचपन में टकराए थे और जिनसे पत्र व्यवहार करने की इच्छा थी और जो इच्छा अबतक पूरी ना हो पाई थी क्योंकि उन किरदारों का पता नहीं था मेरे पास.
“नूह का कबूतर” ने ये सिखाया कि पत्र तो बिना पते के भी लिखे जा सकते हैं. अपना संदेश अपने प्रिय किरदार तक पहुंचाने की चाह हो तो पते का लापता होना आड़े नहीं आता.
“नूह का कबूतर” = मधुर पातियों को सहेजे एक सुंदर किताब.
शुक्रिया विकास रावल जी मुझ तक यह उपहार भेजवाने के लिए.
शुक्रिया प्रगति राज जी मुझ तक यह उपहार बोनस के साथ यानि मेरा नाम खुदे कलम के साथ लाने के लिए.
हिंदीस्थान प्रकाशन एवं संकलन कर्ता आमिर हमजा जी मोबाइल के जमाने में हमें चिठ्ठियों तक ले जाने के लिए
साधुवाद.
✒ प्राची
